भाषा शिक्षण में पुस्तकालय का उपयोग

भाषा शिक्षण का उपयोग सिर्फ पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं बल्कि पढ़कर समझना, विचारना, योजना बनाना, कल्पना करना, अपने मन की बात साझा करना, तर्क देना, चर्चा-परिचर्चा में प्रतिभाग करना आदि बहुत-सी अन्य दक्षताएँ भी भाषा शिक्षण का ही अंग होती हैं। जिन पर सामान्य स्थिति में हम अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करते। सही शब्द, भाव, भाव सम्‍प्रेषण के अभाव में हम अपनी बात स्पष्टता व दृढ़ता से दूसरों तक नहीं पहुँचा पाते हैं। चूँकि हम अपने अनुभवों के आधार पर चीजों को देखते-परखते व सम्‍प्रेषित करते हैं इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम किसी स्थिति या विषय पर अधिक से अधिक अनुभव ग्रहण करें व किसी विषय को विभिन्न नजरियों, कोणों से देखते हुए उसके बारे में अपनी समझ बनाएँ।

भाषा के स्तर पर ये कार्य भाषा की तमाम विधाओं का अध्ययन कर किया जा सकता है। इसको हम दो भागों में बाँटकर देख सकते हैं।

  • भाषा की विभिन्न विधाओं पर प्रकशित किताबें पढ़कर व उन पर विस्तार से बातचीत कर।
  • स्वंय के अनुभवों को लिखकर, बोलकर।

प्राथमिक स्तर पर भाषा में काम करते हुए मैंने पाया कि ध्यान न दिलाने पर या किसी बात को व्यक्त करने का अवसर न मिलने पर वह बात अपना असर कम कर देती है या हमारी स्मृति से हट जाती है। वह कभी हमारी समझ व विचार का हिस्सा नहीं बन पाती। जो फर्क देखने और अवलोकन करने में है वही फर्क सिर्फ पढ़ने, पढ़कर लिखने और पढ़कर समझने व विचार करने में है।

सही अवलोकन व समझ का प्रभाव हमारी सम्‍वेदनशीलता, तर्कों व अभिव्यक्ति पर पड़ता है। उपरोक्त घटक हमारे व्यक्तित्व को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मैंने अपने शिक्षण में शुरू से ही कहानी-कविता का उपयोग किया और इसके असर को जाना समझा था। बच्चों को अपने स्तर पर उपलब्ध बाल पत्रिकाएँ भी पढ़वाई थीं। अपनी छोटी सी लाईब्रेरी भी बनाई थी। पर इस काम में सोने पे सुहागा हुआ जब स्कूल पुस्‍तकालय में ‘रूम टू रीड’ की करीब एक हजार किताबें आईं। साथ ही कुछ नई किताबें विभाग की ओर से भी आईं। कुल मिलाकर लगभग बारह सौ किताबें हमारी लाईब्रेरी में हो गईं। इतनी सारी किताबें उपलब्ध होने से पूर्व में चल रहे काम को और गति मिली। बच्चों के साथ इस पुस्तकालय की शुरुआत मैंने उन्हें रोज नई कविताएँ व कहानियाँ सुनाकर की। नए-नए चित्रों पर बातचीत कर कक्षा में चर्चा-परिचर्चा करवाई। बच्चों के साथ स्वयं बनाई कहानी-कविता पर कक्षा 3, 4, 5 के साथ पहले से ही मैं काम कर रही थी जिसके परिणामस्वरूप ही अनेक बच्चों की कविताएँ विभिन पत्रिकाओं जैसे चकमक, बालप्रहरी, आलोकपथ में भी छप रही थीं।

जब प्रधानाध्यापिका महोदया दस दिवसीय सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण में प्रतिभाग करने बीआरसी मनेरी गईं तो मेरे ऊपर पूरे विद्यालय को अकेले सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी आई। मैंने कुछ ऐसा करने की योजना बनाई जिससे कि बच्चों की शैक्षिक दक्षता में गुणात्मक वृद्धि हो और साथ ही कुछ सृजनात्मक-रचनात्मक कार्य हो। ताकि विद्यालय की सम्पूर्ण गतिविधियाँ बिना अतिरिक्त बोझ के हो सकें। मैंने इसके लिए कक्षा चार-पाँच के साथ दस दिवसीय कार्ययोजना बनाई। जिसमें चित्र पठन, चित्र लेखन, शब्दों से कहानी बनाना, मनचाहे विषय पर कविता लिखना, दिए गए विषय पर अपने अनुभव लिखना, वार्तालाप, दैनिक जीवन अनुभव पर आधारित साक्षात्कार, लिखी गई कविता-कहानी पर चित्र बनाना, अपनी बात समूह में साझा करना व मिल-जुलकर समूहों में अपनी-अपनी बाल पत्रिकाएँ बनाने को शामिल किया।

इन दस दिनों में हमने खूब काम किया। और हमें पता भी नहीं चला कि हम कक्षा में काम कर रहे हैं। बच्चों को खाना खाने के लिए भी बार-बार बोलना पड़ता। हर बच्चा अपने समूह में अपनी महत्‍वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराना चाहता था। हमारी इन गतिविधियों में प्रत्येक बच्चे के लिए जगह थी। हर बच्चे की रचना को बराबर प्रोत्साहन व स्थान था। सबको अपनी बात साझा करने व अपना काम समूहों में दिखाने के लिए प्रयाप्त समय व मौके दिए गए। इसलिए इसमें पारम्परिक कक्षाओं की तरह न तो कोई कम था न कोई ज्यादा। न ही छोटी-छोटी मात्राओं वाली गलतियों के लिए डाँट थी। इतने दिन मैंने सिर्फ चार बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा- समझ, विचार, कल्पना और खुद को व्यक्त कर पाना।

इन दस दिनों में बच्चों के साथ मेरा सम्‍बन्ध और भी आत्मीय और सीखने-सिखाने वाला रहा। बच्चों को खूब मजा आया और तमाम शैक्षिक दक्षताएँ भी निखरीं। इन तमाम गतिविधियों ने किताबों के प्रति बच्चों की रुचि बढ़ाई व उनमें किताबों के प्रति अपनापन व सुरक्षा का भाव भी जगा।

इसके बाद मैंने बच्चों को स्वयं पुस्‍तकालय का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए पुस्तकालय प्रयोग के नियम व समय सारणी तय की। पुस्तकालय से सम्बन्धित बहुत सी गतिविधियाँ तय कीं और इसमें बच्चों की सहमति व साझेदारी तय की। जैसे- पुस्तकों का लेन-देन, रखरखाव, चार्ट लगाना, बातचीत, चर्चाएँ करना, अपनी पढ़ी किताब के बारे में सुबह की सभा में सबको बताना आदि। बालसखा कक्ष हमारा प्रिय कक्ष बन गया।

इसी क्रम में लगभग दो वर्ष तक पुस्तकालय में काम करते हुए मैंने सोचा कि क्यों न अब पुस्तकालय की पुस्तकों का उपयोग भाषा शिक्षण के दौरान पाठों की समझ बढ़ाने व पाठ्यक्रम में निहित दक्षताओं को पाने में किया जाए। पाठ्यपुस्तक व अन्य पुस्तकों की साझोदारी से विषय पर व्यापक समझ बनाई जाए। विषयों की दीवार हटाई जाए। बच्चों में किसी खास विषय के बारे में और अधिक जानने की इच्छा जगाई जाए। किसी खास सम्बोध को मानवीय, सामाजिक, भौगोलिक, वैज्ञानिक व कल्पना के स्तरों पर देखने समझने का कौशल बच्चों में लाया जाए।

इस काम को सावधानी से करना था ताकि बच्चों को किसी तरह का अतिरिक्त बोझ ना लगे। किताबों के प्रति उनकी रोचकता कम न हो, कहीं ऐसा न हो कि उनकी रुचि पाठ्यपुस्तक पढ़ने में कम हो जाए।

अभी मैंने जिन बच्चों के साथ यह काम करना शुरू किया है वे कक्षा 4 व 5 के बच्चे हैं। ये बच्चे पिछले दो सालों से पुस्तकालय का उपयोग कर रहे हैं। इनकी मेरी आपसी समझदारी, आत्मीयता व प्रेम ने ऐसा माहौल बनाया है कि हम एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। कुल मिलाकर माहौल नई पाठ्य योजना हेतु तैयार है।

मैं अपने भाषा शिक्षण से यह चाहती हूँ कि बच्चे एक विषय को विभिन्न पहलुओं से देखना सीखें, विभिन्न पहलुओं पर विचार करें, बात को समझने के लिए प्रश्न करें, खुद अपने जवाब तलाशें, चीजों को जोड़कर और अलग-अलग करके देखें, परखें।

मेरा विश्वास है कि ऐसा करने से उनमें विचार करने की क्षमता बढे़गी। मेरा उद्देश्‍य  उनका मूल्यांकन करना नहीं बल्कि किसी कहानी या कविता का एक सार्थक व गहरा असर डालना है जो उम्र के साथ उनके जीवन की विभिन्न गतिविधियों को प्रभावित करेगा।

मैंने पुस्तकालय से ऐसी पुस्तकें छाँटनी शुरू कीं जिनका उपयोग मैं कक्षा चार व पाँच की भाषा पुस्तिका के साथ करना चाहती थी। मनचाही किताबें मिलने पर मैंने अपना काम शुरू किया। काम की शुरुआत करते हुए मैंने प्रक्रिया के दस्तावेजीकरण की ओर खास ध्यान नहीं दिया। बाद में लगा ये सारी प्रक्रिया मेरे शिक्षण कार्य में बहुत मददगार होने वाली है। तो कक्षा के अवलोकन व बच्चों के कुछ लिखित कामों को अपनी डायरी में नोट किया। जिनमें से कुछ यहाँ साझा कर रही हूँ।

ये कक्षा चार के भाषा शिक्षण के दौरान हुई कुछ गतिविधियाँ हैं।

एक हजार बाल्टी पानी :  उत्‍तराखण्‍ड की कक्षा 4 की हिन्‍दी पाठ्यपुस्‍तक का  पाठ-5

ये कहानी एक व्हेल मछली और छोटे लड़के युकियो की है। यूकियो का गाँव समन्दर किनारे है और वहाँ के लोग व्हेल का शिकार कर अपना जीवन चलाते हैं। कहानी तब महत्वपूर्ण बन जाती है जब ज्वार के साथ आई एक व्हेल की जान बचाने के लिए पूरा गाँव युकियो की मदद करता है। अन्‍ततः भाटे के साथ आई लहरें व्हेल को वापस समुद्र मे ले जाती हैं।

मैंने इस पाठ पर काम करने के बाद पुस्तकालय से 4 और किताबें छाँटी। 1. तीन मछलियाँ 2. व्हेल 3. मछलियाँ पानी में तैरती हैं, 4. मच्छो मछली।

व्हेल किताब में हमने खूब सारे चित्रों के साथ व्हेल के बारे में जाना। बच्चों को व्हेल के रहन-सहन, खान-पान व विशेषताओं के बारे में पता चला। यह भी पता चला कि व्हेल दुनिया की सबसे बड़ी जीव है। एक फोटो में व्हेल के साथ एक गोताखोर का भी चित्र था। बच्चे उस चित्र को देखकर अनुमान लगाने लग गए कि युकियो ने इतनी बड़ी व्हेल पर कैसे पानी उड़ेला होगा। उन्होंने अपने गाँव के गाड़ में देखी मछली के आकार की तुलना की। और अपनी आँखें खूब फैलाकर समुद्र की विशालता का भी अनुमान लगाया। वे समुद्र की विशालता की तुलना पर्वत और आसमान से करने लगे। उन्होंने कहा कि अगर व्हेल उनके गाँव में आती तो उसके लिए कितनी जगह चाहिए होती। बच्चों ने अनुमान लगाया कि गाँव के सारे सेरे (खेत) में तो सिर्फ एक ही व्हेल रह पाती। शायद इसीलिए व्हेल मछली समुद्र में रहती है। 

फिर हमने इसी तरह की चित्रों वाली एक और किताब पढ़ी - मछलियाँ पानी में तैरती हैं। इस किताब में विभिन्न मछलियों के चित्रों के साथ मछलियों के रहन-सहन, प्रकार, आदतों आदि के बारे में बताया गया है। किताबें देखने-पढ़ने के बाद मैंने बच्चों से पूछा क्या तुम मुझे इस किताब के आधार पर मछलियों के बारे में कुछ बातें बता सकते हो। सबके हाथ खडे़ हो गए।

प्रीति- मछलियाँ गिल्स से साँस लेती हैं।

मनीषा- व्हेल मछली बहुत देर तक पानी से बाहर रहकर साँस ले सकती हैं। (व्हेल वाली किताब से)

विशाल- कुछ मछलियाँ गर्म पानी में भी रहती हैं।

अरविन्द- अलग-अलग पानियों में अलग-अलग मछलियाँ रहती हैं।

मनोज- बहुत सारी मछलियाँ अजीब दिखती हैं। मछली जैसी नहीं दिखतीं। (मछली के प्रचालित चित्र से अलग)

शुभम- गुफाओं में रहने वाली मछलियाँ अन्धी होती हैं।

 

शुभम की अवलोकन व कल्पना दृष्टि सबसे अलग है। वो पढ़ने-लिखने में बाकी बच्चों से कम है पर हमेशा उन बातों पर ध्यान दिलाता है जिन पर बाकी बच्चे ध्यान नहीं देते। ऐसा क्यों होता होगा शुभम? क्योंकि उन्हें आँखों की जरूरत ही नही होती होगी। अन्धेरी गुफा में वे क्या देखेंगी? शुभम ने जबाव दिया।

मच्छो मछलीतीन मछलियाँ कहानी की किताब हैं। मैंने मच्छो मछली की कहानी बच्चों को सुनाई। फिर पढ़कर दुबारा सुनाई। फिर बच्चों ने उसे समूह में पढ़ा। लिखित कार्य हेतु मैंने तीन मछलियाँ कहानी चुनीं। यह कहानी झील में रहने वाली तीन मछलियों की कहानी है। जिन्हें एक दिन पता चलता है कि कल मछुआरे झील में जाल डालने वाले हैं। जाल से बचने के प्रयास में छोटी मछली को चोट लग जाती है बड़ी मछली जाल में फँस जाती है, जबकि नन्ही मछली पहले दिन ही झील के दूसरे किनारे पर चली जाती है। कहानी में नन्ही मछली की जगह बच्चे अपने आपको महसूस कर पाते हैं।

निजी जिन्दगी में बच्चों के अस्तित्व को खास स्थान नहीं दिया जाता। उनकी बातों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में कहानी का नन्हा पात्र जब अपनी समझदारी दिखाकर बड़ों पर भारी पड़ जाता है तो बच्चे बहुत खुश होते हैं। वे उसकी जीत में अपनी जीत महसूस करते हैं। खुद को महत्वपूर्ण महसूस करते हैं। यह किताब हमारे पास तीन प्रतियों में है। इसकी खासियत यह है कि इसमें पैच वर्क किया हुआ है। जिसे स्पर्श कर बच्चे मछली की त्वचा, पानी व जाल आदि को महसूस कर सकते हैं। जिससे कहानी की रोचकता बढ़ जाती है। वैसे भी ज्यादातर बच्चों के पास मछली को लेकर अपने पर्याप्त अनुभव हैं। कहानी सुनाने, पढ़ने व पर्याप्त बातचीत के बाद मैंने बच्चों से कहा कि वे मुझसे कहानी पर आधारित प्रश्न पूछें। मैं उनका जबाब देने की कोशिश करूँगी। अगर मैं किसी प्रश्न का जबाब नहीं दे पाई तो हम मिलकर उस प्रश्‍न का जबाब ढूँढ़ने की कोशिश करेंगे। बच्चों ने ढेरों सवाल पूछे। मैंने उनसे कहा क्या वे इन सवालों को लिखकर पूछेंगे। हम कक्षा में अक्सर सवाल बनाने वाली गतिविधि करते रहते हैं। बच्चे सवाल बनाने लगे। उन्होंने हर तरह के सवाल बनाए। औसतन हर बच्चे ने 25-35 सवाल बनाए। प्रियंका ने 41 सवाल बनाए। इस बीच मैंने भी उनके लिए 6 सवाल बनाए। बच्चों के बनाए सवालों में स्मृति आधारित सवाल ज्यादा थे पर समझ व अनुप्रयोगी सवालों की भी कमी नहीं थी। कुछ सवाल कौशलात्मक भी थे।

जैसे-

1.  मछुआरों की बात किसने सुनीं ?

2.  कौन सी मछली तेजी से तैरती थी?

3.  मछलियों को कैसे पता चला कि कल मछुआरे आने वाले हैं?

4.   अगर बड़ी मछली आलसी नहीं होती तो क्या होता?

5.   जब छोटी मछली को चोट लगी होगी तो उसने क्या सोचा होगा?

6.   जाल कैसे बनता है?

7.   कैसे पता चला कि छोटी मछली होशियार थी?

8.   मछलियाँ जाल को तोड़ क्यों नहीं पाती होंगी?

9.   छोटी मछली ने क्यों कहा कि मुझे कोई पकड़ नहीं सकता?

10.  अगर दोनों मछलियाँ नन्ही मछली की बात मानतीं तो क्या होता?

11.   छोटी मछली ने बड़ी मछली से क्या कहा?

12.   अगर मछुआरों का जाल इतना बड़ा होता कि वो झील के दूसरे किनारे तक पहुँच जाता तो क्या होता?

13.    मछुआरे मछलियों को क्यों पकड़ते होंगे?

14.    जिस दिन मछुआरे झील को देखने आए तो उन्होंने उसी दिन मछलियाँ क्यों नहीं पकड़ीं ?

15.    अगर मछुआरे झील के किनारे नहीं आते तो क्या होता?

16.    नन्ही मछली उन दोनों मछलियों को जबरदस्ती अपने साथ क्यों नहीं ले गई ?

कुछ अन्य पाठों पर बातचीत करते हुए मैंने बच्चों के अनुभवों के आधार पर किताबें ढूँढनी चाहीं तो उन्होंने कई किताबों के सन्‍दर्भ दे दिए। जब हमें पुस्तकालय में कोई कविता या कहानी ऐसी मिल जाती है, जो बच्चों की पाठयपुस्तक में भी है तो बच्चे खुशी से उछल पड़ते हैं। लालू और पीलू कहानी से शुरू हुआ सफर आज पुस्‍तकालय के सर्वोत्‍तम स्तर तक पहुँच गया है। भले ही कुछ बच्चे अभी भी लिखने के स्तर पर गलतियाँ करते हों, पढ़ने में कमजोर हों पर उनमें कल्पनाशीलता, संवेदना, आत्मभिव्यक्ति मुखरता,तर्क-वितर्क व निष्कर्ष तक पहुँचने की दक्षताओं में कहीं कमी नहीं है। बहुत से बच्चों को कविता व कहानी विधा की स्वयं के लेखन में भी सही-सही पहचान हो गई है। वे अपनी स्वयं की कविता कहानियाँ बनाते-सुनाते हैं। उनमें वो आत्मविश्वास है जिस पर कोई भी शिक्षक गर्व कर सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मैंने पाया कि-

  • बच्चे समूह में ज्यादा बेहतर काम करते है।
  • कक्षा में काम करते हुए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे एक दूसरे के सहयोगी बनकर सीखें, प्रतियोगी की भावना तो धीरे-धीरे स्वयं उनमें आ जाएगी।
  • प्रत्येक बच्चे की सीखने की गति व दक्षताएँ भिन्न होती हैं इसलिए बच्चों के साथ काम करते हुए धैर्य व समझ से काम लेना होता है।
  • बिना दबाव व मूल्यांकन की भावना के पाठ्यपुस्तक के साथ अन्य पुस्तकों का सहज प्रयोग पाठ की रोचकता बढ़ा देता है। साथ ही एक विषय के विभिन्न पहलुओं पर भी समझ बनाता है।
  • भाषा प्रत्येक विषय की नींव है यदि भाषा में बच्चे की समझ अच्छी है तो यह अन्य विषयों को समझने में निश्चित मदद करती है।

मैंने जिन उद्देश्‍यों को ध्यान में रखकर अपनी कार्ययोजना बनाई थी वो सफल रही। मैं आगे भी इस तरह का काम अपनी कक्षाओं में करती रहूँगी आखिर मुझे अपने बच्चों पर नाज जो है। ये प्रक्रियाएँ मीठे फल पाने की आस में बीज भरा-पूरा वृक्ष बनेंगी अपनी उपस्थिति से सबका मन मोह लेंगी और जीवनोपयोगी तो होंगी ही।


रेखा चमोली ,सहायक अध्‍यापिका, राजकीय प्राथमिक विद्यालय,गणेशपुर ,भटवाड़ी, उत्तरकाशी, उत्‍तराखण्‍ड   

टिप्पणियाँ

om parkash sharma का छायाचित्र

पुस्तकालय विद्यालय का हृदय होता है। विद्यालय में पुस्तकालय कार्यात्मक होना चाहिए। यदि शिक्षक विद्यार्थियों में पुस्तकालय में बैठ कर या वहाँ से ले जाकर पुस्तके पढ़ने के लिए प्रेरित करने में सफल हो जाता है तो उसका आधा काम समाप्त हो जाता है। शिक्षक का यह प्रयास शिक्षार्थी के पूरे जीवन में उसके ज्ञानार्जन में उसका सहायक होता है। आपका यह प्रयास सराहनीय है।

nrawal का छायाचित्र

बहुत अच्छा प्रयास है......इससे बच्चों में आपस में बातचीत का स्त र भी बढ़ेगा और वे पुस्तकों से ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करेंगे .आप इस तरह के प्रयास करते रहने के लिए स्वयं ही प्रेरित हैं ....यह एक बच्चों के लिए बहुत ही अच्छा है

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