बच्चे, विज्ञान और बल की अवधारणा : विज्ञान शिक्षक की डायरी

विज्ञान में बल पढ़ाने के दौरान मेरे क्या अनुभव थे वो साझा कर रहा हूँ। मैं यह अनुभव रोजाना की मेरी डायरी से ले रहा हूँ जो तब लिखी थी जब मुझे अज़ीम प्रेमजी संस्थान ने टोंक के मोलईपुरा गाँव के स्कूल की कक्षा 7वीं में विज्ञान पढ़ाने का मौका दिया ।

शुरू में कुछ दिन बच्चों और शिक्षकों के साथ अपना ताल-मेल बिठाकर और अवलोकन करने के बाद मैंने “बल” पढ़ाना शुरू किया । 

21-Sep-2016

आज मुझे मेरे प्लान के हिसाब से बल की शुरुआती अवधारणा (धक्का देना, खेंचना, खोलना और बन्‍द करना) पर बात शुरू करनी थी ।

मैं : बल किसे कहते हैं ?

रामदेव : बिल, चूहे का !

रामकेश : रस्सी का बल ! 

मैं : ताकत या बल।

बच्चे : लड़ने की ताकत।

बच्ची : ताकत मतलब....हिम्मत।

मैं : सोचो बल के और उदाहरण क्या होंगे ?

बच्चे सोचने लगे...।   

मैंने अशोक को बुलाया और टेबल को धक्का देने के लिए कहा। अशोक ने टेबल जैसे ही सरकाई, वैसे ही मैंने कहा कि अशोक ने ताकत लगाकर या कहें बल लगाकर टेबल सरकाई। अशोक से मैंने कहा कि इस टेबल को अपनी ओर खींचों। जैसे ही अशोक ने टेबल खींची वैसे ही मैं बोला कि अशोक ने टेबल पर बल लगाकर टेबल को अपनी ओर खींच लिया। उसके बाद मैंने टीकम को बुलाया और दरवाजे को बन्‍द  करने के लिए कहा। जैसे ही उसने दरवाजा बन्‍द किया, तो मैंने कहा कि टीकम ने दरवाजे पर बल लगाकर दरवाजा बन्‍द कर दिया। मैंने दीपक को बुलाया और कहा कि अब तुम टीकम से दरवाजे पर बल लगाने को बोलो। उसने टीकम को बन्‍द  दरवाजा दुबारा बन्‍द करने को कहा। मैंने कहा यह तो पहले ही बन्‍द है, हाँ इस पर बल तो लगेगा पर क्या और कोई तरीका है जिससे हमें दिखे कि टीकम दरवाजे पर बल लगा रहा है। दीपक ने तुरन्‍त टीकम को दरवाजा खोलने के लिए कहा।

मैं : क्या दरवाजा खोलने में बल लगेगा ?

बच्चे : हाँ।  

मैं : क्या और भी कोई उदाहरण हैं जो आप बता सकते हो ?

रामदेव : (कॉपी को मोड़कर बताया) कॉपी मोड़ने में बल लग रहा है।   

मैं : हाँ, बिलकुल बल लग रहा है, फिर मैंने सभी बच्चों को कॉपी खोलने के लिए कहा।

मैं : क्या कॉपी खोलने में भी बल लग रहा है ?

बच्चे : हाँ।

मैं : सब बच्चे अपनी कॉपी बन्‍द कर दो।

मैंने : क्या कॉपी बन्‍द करने में बल लग रहा है ?

बच्चे : हाँ 

एक शिक्षक (ओमप्रकाश जी) पीछे बैठकर मेरी कक्षा का अवलोकन कर रहे थे, उनसे रहा नहीं गया, उन्होंने भी एक सवाल पूछ ही लिया। बताओ बच्चो कॉपी उठाने में भी बल लगेगा क्या ?

बच्चे : हाँ।

रामदेव : कॉपी नीचे गिराने में कोई बल लगेगा क्या ?

ओमप्रकाश जी पीछे से बोल पड़े गुरुत्वाकर्षण बल लगेगा। मैंने भी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्‍त को सीधे-सीधे बोल दिया। इसके बारे में ज्‍यादा बात नहीं की, क्योंकि 40 मिनट में से अब आधा समय जा चुका था और मुझे लगा कि अगर इसे अभी बता देता, तो शायद बल का सिद्धान्‍त जो गति पकड़ चुका है वो रुककर बिखर जाता।  (जब मैंने कक्षा छोड़ी तब ही मैंने मन बना लिया था कि कल गुरुत्वाकर्षण बल पर थोड़ी गहराई में बात करूँगा, क्योंकि यह प्रश्न बच्चे की तरफ से आया है।)  

मैं : कॉपी बन्‍द करने में बल किसने लगाया ?

बच्चे : हाथ ने।

मैं : हाथ किसका है ? अपना ! तो मेरे हाथ ने बल लगाया या  व्यक्ति का नाम बोल सकते हो।

मैं : बल किस पर लग रहा है ?

बच्चे : कॉपी पर।

आज सिर्फ बल की शुरुआती अवधारणा पर बात सफल रही ।

22-Sep-2016

मेरा आज का प्लान था कि मुझे बल की अवधारणा (दो बलों का जुड़ना, गुरत्वाकर्षण बल, पेशीय बल, विराम, गतिशील अवस्था, गति में बदलाव और दिशा में बदलाव) पर बात करनी है ।

मैं : कल जो किया था उसे कहानी के रूप में कौन सुनाएगा ?

बच्चे : चुप रहे।

फिर मैंने ही शुरू किया और पूछा कि बल किसे कहते हैं ?

रामकेश : रस्सी के बल को।

मैं : हम यहाँ रस्सी में जो बल पड़ते हैं उसकी बात नहीं कर रहे हैं।

एक बच्ची : चूहे का बिल।

मैं : चूहे के बिल में तो चूहा रहता है, हम ताकत वाले बल कि बात कर रहे हैं।

कोमल : (झिझकते हुए बोली) धक्का देना।

मैं : हाँ सही, और कौन बताएगा ?

कोमल और सब बच्चे : खींचना।

मैं : बच्चों, टीकम से हमने क्या करवाया था ?

बच्चे : दरवाजा बन्‍द करना और खोलना।

मैं: कॉपी पर भी बल लग रहा था क्या ?

बच्चे : हाँ, खोलने में और बन्‍द करने में।

मैंने कहा कॉपी गिराने में कोई बल लग रहा था क्या ?

सभी बच्‍चे सोच में पड़ गए और आँखों से बोलने लगे नहीं लगेगा, कुछ ने सिर हिलाकर भी मना किया।

मैंने कहा : तुमने चुम्बक देखी है ?

बच्चे : हाँ।

मैं : चुम्बक लोहे को क्या करती है ?

बच्चे : खींचती है।

मैं : ऐसे ही पृथ्वी सभी चीजों को अपनी ओर खींचती है और इस खींचने को क्या कहेंगे ?

कोमल : बल।

मैं : हाँ, इसे बल कहेंगे पर कौन-सा बल ?

बच्चे सोचने लगे...।

मैं : कौन खींच रहा है ?

बच्चे : पृथ्‍वी।

मैं : मतलब पृथ्‍वी बल लगा रही है तो कौन-सा बल हुआ ?

बच्चे : पृथ्‍वी बल।  

मैं : पृथ्‍वी बल कह सकते हो, पर इसे विज्ञान की भाषा में गुरुत्व + आकर्षण बल : गुरुत्वाकर्षण बल कहते हैं।

मैं : जब कॉपी नीचे गिरी तो गुरुत्वाकर्षण बल लगा रहा था। परन्‍तु कॉपी के उठाने पर कौन-सा बल लगा होगा ?

सब बच्‍चे सोचने लगे..।

मैं : कॉपी किस चीज से उठाई ?

बच्चे : हाथ से।

मैं : हाथ में क्या है ? ( अपना हाथ को दिखाते हुए मैंने पूछा)

कोमल : चमड़ी।

मैं : और ?

रामदेव : हड्डी ।

मैं : चमड़ी और हड्डी के बीच में ?

कोमल : (धीरे से बोली) मांस।

मैं : हाँ, मांस या मांसपेशी, तो कौन-सा बल लगेगा।

बच्चे : मांसपेशी बल।

मैं : हाँ, मांस + पेशी बल, इसे विज्ञान में पेशीय बल कहते हैं।

मैंने धर्मराज से कुर्सी को सरकाने के लिए कहा और बच्चों से पूछा यह कौन-सा बल है ?

बच्चे : पेशीय बल।

मैंने धर्मराज से कहा अब तुम उछलो और बच्चों से पूछा कि यह कौन-सा बल है ?

बच्चे : पेशीय बल।  

मैं : धर्मराज किस जगह से बल लगा रहा है ?

बच्चे : पैरों से।

मैं : पैरों में मांसपेशियाँ होती है, इसलिए यह पेशीय बल है।

मैंने एक गेंद निकालकर गोना और मधु को दे दी और कक्षा के पीछे आमने-सामने खड़े होने को कहा। मधु के हाथ में गेंद देकर उसे गोना की तरफ लुड़काने के लिए कहा।

मधु और गोना गेंद को एक-दूसरे की तरफ लुड़काने लगीं।

मैंने गोना से कहा  गेंद को तुम दोनों के बीच में रख दो।

मैं : यह कौन-सी अवस्था है ?

बच्चे : रुकी हुई।

मैं : हाँ रुकी हुई, और इसे विराम या स्थिर अवस्था भी कहते हैं।

मैंने गोना को गेंद को धक्का देने के लिए कहा और बच्चों से पूछा यह कौन-सी अवस्था हुई ?

बच्चे : चलने वाली।

मैं : हाँ, चलने वाली या गतिशील अवस्था भी कहते हैं।

मैंने रामदेव और देव नारायण को बुलाया और एक कुर्सी के आमने-सामने से धक्का देने के लिए कहा। उन्होंने धक्का दिया, पर कुर्सी वही रुकी रही।  

मैं : इन दोनों ने बल लगाया और यह कुर्सी एक जगह रुकी रही, मतलब इन दोनों ने समान बल लगाया होगा।

मैंने रामदेव को ज्‍यादा बल लगाने को कहा। रामदेव ने ज्‍यादा बल लगाया तो दूसरी तरफ कुर्सी खिसक गई। मैंने कहा, इसका मतलब अगर एक तरफ ज्यादा बल लगेगा तो कुर्सी दूसरी तरफ चली जाएगी। फिर मैंने रामदेव और देव नारायण को कहा अब एक दिशा में धक्का दो। जैसे ही दोनों ने एक दिशा में धक्का लगाया तो कुर्सी तेज गति करने लगी ।

मैं : एक तरफ बल लगाने से कुर्सी तेज गति करने लगी, इसका क्या मतलब हुआ ?

कोमल : डबल धक्का लगा।  

मैं : डबल धक्का मतलब क्या दोनों के द्वारा लगाए गए बल जुड़ गए और धक्का लगा ?

बच्चे : हाँ।    

इसके बाद मैंने बच्चों से इस पर कहानी बनाने के लिए कहा जिसमें धक्का, खींचना, उठाना इत्यादि को शामिल कर सकते हैं और गाँव से दूसरे उदाहरण भी लिख सकते हैं ।

आज प्लान के हिसाब से सिर्फ गति में बदलाव और दिशा में बदलाव पूरा नहीं हो पाया जो कि कल पूरा करूँगा ।

23-Sep-2016

आज मुझे बल की अवधारणा (गति में बदलाव, दिशा में बदलाव, आकृति में बदलाव) और निष्कर्ष पर काम करना था। मैं कक्षा में गया तो देखा कि दो बच्चे नए आए थे, सूरज और महेंदर। मैंने कल जो बल पर काम किया था उसकी कुछ बच्चों ने अपने गाँव से जोड़कर कहानी सुनाई या फिर कहें कि कुछ उदाहरण दिए, जैसे ज्योति कुँए पर से पानी निकालने के लिए रस्सी खींचती है इत्यादि। उसके बाद मैंने थोड़ा दोहरान भी कल के काम का करवा दिया, जैसे विराम अवस्था या स्थिर अवस्था, गतिशील अवस्था और दो बल एक दिशा में लगेंगे तो वह बल जुड़ जाएँगे इत्यादि । इनसे मैंने दो नए बच्चों को जोड़ने की कोशिश की। कोमल को पेशीय बल थोड़ा कम समझ आया था तो जब मैंने सभी से पूछा कि कोई और सवाल मन में आए तो बेहिचक पूछ लो। तब कोमल की तरफ से एक प्रश्न भी आया था कि मांसपेशीय बल किसे कहते हैं यह समझ नहीं आया ? आज जब कोमल से मैंने पूछा तो वो अपना प्रश्न भूल गई थी और दूसरा ही कुछ प्रश्न बता रही थी। परन्‍तु मनीषा ने कोमल को चुपके से याद दिला दिया कि उसने कल क्या पूछा था। इस पूरी बात में मुझे दो चीज़ें अच्छी लगीं।

पहली : मुझे अच्छा लगा कि मनीषा जो लिखने में कमजोर है और चुप-चुप रहती है, वो बहुत ही ध्यान लगाकर कल की सारी गतिविधि और बातें सुन रही थी। इससे एक और बात मेरे मन में पुख्ता हुई कि हमउम्र से सीखने का बड़ा प्रभाव होता है । अगर बच्चे को बिना फेल करे आगे वाली कक्षा में बढ़ाते रहें और उसके साथ कुछ एक्सट्रा या छूटी हुई चीजें होती रहें तो बच्चा कुछ न कुछ तो सीख ही रहा होता है और धीरे-धीरे वो सभी के साथ चलने लगता है ।

दूसरी : यह बात मुझे अच्छी लगी कि जब कोमल को कुछ चीज समझ नहीं आई तो मेरे पूछने पर उसने जो समझ नहीं आया वो पूछ लिया। मैं यह भी आशा कर रहा हूँ कि आगे चलकर बच्चे मेरे बिना पूछे ही जो कुछ समझ नहीं आएगा बेझिझक पूछ लेंगे। मैं जब पढ़ता था तब जब भी शिक्षक हमसे पूछते थे कि “समझ गए न” तब अक्‍सर ही हम शिक्षक की हाँ में हाँ मिला देते थे, चाहे फिर भले ही समझ न आया हो।   

फिर मैंने ज्योति और रामकेश को बुलाया और उन्हें गेंद देकर एक से दूसरे की तरफ लुड़काने के लिए कहा ।

मैं : कौन बल लगाकर इस गेंद की गति में परिवर्तन कर सकता है ?

कुछ के हाथ उठे परन्‍तु सबसे पहले कोमल का हाथ उठा। कोमल आई और उसने गेंद को जोर से धक्का मारा।

मैं : लुढ़कती हुई गेंद की गति में परिवर्तन करना है।

फिर कोमल समझ गई। उसने पहले गेंद धीरे लुढ़काई और फिर दो बार उस गेंद को  हाथ से मारा, जिससे गेंद की गति बढ़ गई। कोमल जोश-जोश में गेंद को दो बार धक्का देते-देते गिर गई और जल्दी से ही खड़ी हो गई। सब बच्चे हँसे। मैंने  तुरन्‍त पूछा लगी तो नहीं। और बच्चों की हंसी को नज़रअन्‍दाज करते हुए उनसे पूछा कि आपने देखा कैसे कोमल ने गति परिवर्तन किया। तो सब बच्चे चुप हो गए और सिर हिलाने लगे। मैंने इस प्रक्रिया को एक बार खुद भी करके दिखाया और बताया कि किस प्रकार लुड़कती हुई गेंद पर बल लगाने से उसकी गति बढ़ जाती है ।

मैं : कोई बल लगाकर इस गेंद की दिशा परिवर्तन कर सकता है ?

कोमल : बोली मैं करके दिखाऊँ... 

कोमल ने लुढ़कती हुई गेंद की दिशा भी बल लगाकर बदल दी। मैंने चाक से लकीर बनाई जैसे गेंद लुड़की, कोमल ने गेंद की दिशा बदली और अगर कोमल दिशा नहीं बदलती तो गेंद कहाँ जाती उसकी भी लकीर बनाई। मैंने लकीरों द्वारा भी बच्चों को यह बताया कि किस प्रकार कोमल ने गेंद की दिशा परिवर्तित की और अगर वो दिशा परिवर्तित नहीं करती तो गेंद कहाँ जाती।

इसके बाद मैंने बच्चों को रबर-बैंड दिए और अशोक को एक गुब्बारा देकर फुलाने को कहा ।

मैं : फूले हुए गुब्बारे को दिखाते हुए पूछा, यह कैसा दिख रहा है ?  

बच्चे : गोल।

मैंने गुब्बारे को दोनों हाथों से दबाया और पूछा कि अब यह कैसा दिख रहा है ?

बच्चे: चपटा।

फिर मैंने फूले हुए गुब्बारे का फोटो बनाया और चपटे गुब्बारे का फोटो बनाया।

मैं : बल लगाने से गुब्बारे को क्या हो गया ?

बच्चे : चपटा हो गया...।

फिर मैंने उसकी हवा निकाल दी और उसे खींचा और पूछा अब यह कैसा हो गया ?

बच्चे : लम्‍बा हो गया...। 

जैसे ही मैंने गुब्बारे को खींचा उसके बाद अपने आप कोमल ने रबर-बैंड को खींच कर भी बताया कि इस पर बल लगाने से यह लम्‍बा हो रहा है और फिर सभी बच्चे यही बताने लगे। रबर-बैंड देने का यही उद्धेश्‍य था कि बच्चे अपने हाथों से उसे खींच-तान कर देखें।  

मैं : क्या जब हम इन चीजों पर बल लगाते हैं तो इनकी आकृति में बदलाव आ जाता है ?

बच्चे : हाँ।

इस पर मैंने अन्तिम उदाहरण देते हुए कहा कि हम घर पर आटा गूँधते हैं। क्या उसमें भी हम बल लगाकर आकृति बदलते रहते हैं ? पहले कुछ बच्चे हाँ बोले फिर सभी ने उनका साथ दिया और जैसे आटे की बात आई तो बच्चों में खुसर-पुसर शुरू हो गयी, शायद वो आटा गूँधने से बल को जोड़ रहे हों।

इस प्रकार इन तीन दिनों में बल की अवधारणा बताई गई और अन्‍त में संक्षिप्त भी किया। किस प्रकार बल वस्तु की स्थिति, उसकी गति, गति की दिशा में तथा उसके आकार या आकृति में परिवर्तन कर सकता है ।  


अदनान बुलन्‍द खान, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्‍थान  सभी चित्र : प्रशान्‍त सोनी 

 

 

टिप्पणियाँ

Sunder2013 का छायाचित्र

बहुत खूब सर । किसी कक्षा में 40 मिनट के वादन में एक पूरा कांसेप्ट बताना वास्तव में मुश्किल होता है और अगले दिन उसी कांसेप्ट को आगे बदन उतना ही कठिन । कुछ बच्चों का अनुपस्थित रहना भी समस्या होता है । फिर भी जिस कुशलता के साथ आपने बल की अवधारणा रखी वो काबिले तारीफ है ।

adnanbuland203 का छायाचित्र

पढ़ने और अपने विचार रखते हुए हौसला बढ़ाने के लिए "शुक्रिया" Sunder ji.

adnanbuland203 का छायाचित्र

Prashant Bhai Images are very nice
aur isse article ko jeevantataa mil gayi. Shukriya...!

Rgds
Adnan

Yusuf@123 का छायाचित्र

बहुत खूब अदनान साहब ,आपका पढ़ाने का तरीका क़ाबिले तारीफ है ,एक मुश्किल टॉपिक को बच्चो के अनुसार उन्ही की खेल की शैली में उदहारण सहित समझा क्र एक कुशल अध्यापक होने का सबूत दिया आपने ,धन्येवाद।

adnanbuland203 का छायाचित्र

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