बच्चे और विज्ञान मेला : एक अनुभव

28 फरवरी यानि कि विज्ञान दिवस! अजीम प्रेमजी स्कूल,टोंक के बच्चों ने इस दिन मेले का आयोजन किया। लगभग एक सप्ताह का समय लगाकर बच्‍चों जिस तरह से विज्ञान मेले के आयोजन की प्रक्रिया में अपनी भागीदारी दी, यह काफी उत्साह देने वाला रहा। काम की इस पूरी प्रक्रिया व इसके साथ बच्चों की अन्‍तक्रिया का स्वरूप मुझे कुछ इस तरह से प्रतिबिम्‍बित होता नजर आया है।

आमतौर पर बालमेला,विज्ञान मेला या फिर ऐसे किसी भी आयोजन की रपट इस तरह लिखी जाती है, कि उसमें क्‍या-क्‍या हुआ। लेकिन इस बात का कोई जिक्र नहीं होता कि उससे बच्‍चों ने और खुद शिक्षक ने क्‍या सीखा। वास्‍तव में यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि शिक्षक का अपना नजरिया क्‍या है। क्‍या वह इसे केवल एक आयोजन के तौर पर देखता है या फिर एक अवसर के रूप में जिसमें सीखने-सिखाने की प्रक्रिया खेल-खेल में ही हो जाए।

बहरहाल अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल,टोंक की शिक्षिका अलका तिवारी यह बता रही हैं कि ऐसे आयोजन से उन्‍हें तथा उनके बच्‍चों को हासिल हुआ।  -सम्‍पादक

बच्चों की तैयारी

बच्चों ने लाइब्रेरी की पुस्तकों की मदद से प्रयोगात्मक क्रियाकलापों को चुनते हुए दो-दो के उपसमूह में करने की जिम्मेदारी ली। उस प्रयोगात्मक क्रियाकलाप की कार्य प्रक्रिया को अपने शब्दों में लिखने का प्रयास किया। ताकि अन्य लोगों को आसान शब्दों में इसके बारे में बता पाएँ। बच्चों ने पुस्तकों से वैज्ञानिकों की जीवनी के अंशों को चुनकर कुछ पोस्टर भी तैयार किए। कुछ वैज्ञानिकों के कुछ विचार चुनकर उनके भी पोस्‍टर बनाए !

मेले के दिन सभी जुटे अपने काम को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करने की तैयारी में ! सुबह नौ बजे से डेढ़ बजे तक बच्चे जुटे रहे अपने छोटे-बड़े साथियों और अवलोकनकर्ताओं को अपने क्रियाकलाप के बारे में बताने की प्रक्रिया में। बच्चों ने बच्चों ने खुद अपने लिए जब कुछ प्रयोगात्मक काम चुने तो उनके सामने दो तरह की चुनौतियाँ थी -

  • वे क्या करना चाहते हैं ?
  • क्या -  क्या कर सकते हैं?

इस अवसर को इस रूप में देखा जा सकता है कि जब स्वतंत्रता दी जाती है खुद चुनने की, तो यह स्वतंत्रता कुछ जिम्मेदारियाँ भी अपने साथ लाती है। क्या करना है यह रुचि का सवाल है,पर क्या कर सकते हैं यह सामर्थ्य का। इन दोनों परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठाकर काम करना बच्चों को काफी चुनौतीपूर्ण लगता है। उस चुने हुए काम को स्वतंत्र रूप से करने की प्रक्रिया फिर एक नई जिम्मेदारी लाती है, वह है उस काम को ठीक से क्रियान्वित कर पाने की स्वयं से अपेक्षा। ऐसे अवसर बच्चों के लिए इस तरह का वातावरण तैयार करने में भूमिका निभाते हैं जिसमें बच्चे खुद से संघर्ष करें और बार-बार गलतियाँ करें। कुछ नए विचार खोजें और सोच-विचार की प्रक्रिया में जाते हुए इन्हें एक-दूसरे से साझा करें। थका देने वाली प्रक्रिया के साथ भी बच्चे खुद को इस प्रक्रिया से इस अपेक्षा के साथ जोड़े रखते हैं, और रख भी  पाए कि उन्हें अभी अपने काम को और बेहतर ढंग से करना है। यही उत्साह सीखने के लिए प्रेरित करता है।

मेले का दिन

मेले के दिन बच्चों ने विभिन्न विषयवस्तुओं जैसे दाब, बल, प्रकाश, विद्युत, लैंस, चुम्बक, तैरना डूबना, पत्तियों से विभिन्न जीवों की आकृतियाँ बनाना, पृथ्वी की आन्‍तरिक संरचना, ज्वालामुखी आदि पर आधरित विज्ञान व भूगोल के 26 क्रियाकलापों को प्रयोग व माडल आदि के माध्यम से प्रस्तुत किया। योजनानुसार दो बच्चों ने मिलकर एक क्रियाकलाप की जिम्मेदारी ली और व्यवस्थित रूप से कार्य किया। अन्‍य बच्‍चों ने कक्षावार आकर अवलोकन किया। इस प्रक्रिया के दौरान स्टाल पर काम को संचालित करने वाले बच्चों और अवलोकन के लिए आए बच्चों के बीच संवाद एक ऐसा माध्यम बना, जिसने सीखने-सिखाने के माहौल को सहज बनाते हुए जीवन्तता प्रदान की।   

बच्चों के अवलोकन और उनकी प्रतिक्रियाएँ

अवलोकन के लिए आए बच्चों ने प्रयोग की सामग्री व प्रक्रिया से सम्‍बन्धित सवाल किए। कुछ बच्चों ने गहराई के साथ जिज्ञासा व्यक्त की, जैसे – सुई कागज के साथ ही क्यों तैरती है ! सीधे डालने पर तो डूब जाती है ! क्या हम पृथ्वी के अन्दर जाएँ तो हमें तीन तरह की परतें दिखाई देंगी! पृथ्वी नीचे क्यों नहीं गिरती ! कुण्‍डली क्यों घूमती है ! अगर इसमें भी चुम्बक का गुण आ जाता है तो ये दूसरी चुम्बक से चिपक क्यों नहीं जाती? पानी के बीच में ही भंवर क्यों बनता है ! रोशनी से एक से ज्यादा रंग कैसे दिखते हैं ! पम्प में पानी ऊपर क्यों आता है ! हलकी वस्तु भारी चीज को कैसे उठा पाती है ! पानी डालने पर चक्का क्यों घूमता है !

इन सवालों से बाल मन की उत्सुकता का पता चलता है। प्रदर्शित मॉडलों का अवलोकन करते समय बच्चे बड़ी जिज्ञासा अनुभव कर रहे थे। बच्चों को केवल अवलोकन से संतुष्टि अनुभव नहीं हो रही थी, वे हर उपकरण को टटोलकर देख रहे थे जैसे माचिस में ऐसा क्या है जिससे वह चलते-चलते रुक जाती है ? सौर मण्‍डल में आगे पीछे कौन-कौन है? पहिया घूमने से डिब्बी में कैसे पानी भरने लगता है ! देखते समय बच्चों के चेहरे पर खुशी व उत्सुकता के मिले-जुले भाव थे। जब वे स्वयं मछली को नचाकर देख रहे थे तो उनके चहरे पर खिलखिलाहट थी। गिलास रखने पर सिक्का गायब कैसे हो जाता है, ये गुब्बारा कितनी तेजी से भागता जाता है, ये देखकर वे खुश हो रहे थे। मन में सवाल व उपकरणों से स्वयं खेलने की चाह से बालमन की जिज्ञासा बयां हो रही थी।

पूरी समयावधि को ध्यान में रखते हुए देखा जाए तो छोटी उम्र वाले बच्चे पत्तियों से आकृतियाँ बनाने, गुब्बारे व चाँद,तारे, सूरज वाले माडल, पानी वाले प्रयोगों की ओर अधिक आकर्षित होते रहे। जबकि बड़े बच्चों ने इन गतिविधियों के साथ सिक्का, पृथ्वी की संरचना, पानी का बवंडर, हैण्ड पम्प, रॉकेट मोटर, फव्वारा, तैरती सुई का अवलोकन करने के प्रयोग में भरपूर रुचि ली। ज्वालामुखी के प्रयोग को बच्चों ने उत्सुकता के साथ देखा। आपसी संवाद के दौरान प्रयोगों को संचालित करते हुए बच्चों ने अवलोकनकर्ताओं के सवालों या उनकी अपेक्षाओं को ठीक दिशा देते हुए अपनी ओर से जवाब की ओर ले जाने का प्रयास किया। कुछ सवाल ऐसे भी रहे जो उनके लिए चुनौतियाँ खड़े करते हुए नजर आए। कुछ सवाल ऐसे आए जो माडल कैसे तैयार किया गया इस प्रक्रिया से सम्बन्धित रहे, इनके जवाब भी बच्चों ने सहजता के साथ अपने साथियों को दिए। किसी भी प्रकार की निर्देशात्मक प्रतिक्रिया से मुक्त रहते हुए संवाद हो पाया।

प्रक्रियाओं को समझने की दृष्टि से बच्चे पर्याप्त व्यावहारिक अनुभव ले पाए। बातचीत के दौरान आए सवाल व उन पर जवाबों की प्रक्रिया के दौरान बच्चे संयम के साथ आमना-सामना करते नजर आए । संवाद का अवसर बच्चों में आत्मविश्वास भरने और मन में कुछ नए सवालों को जन्म देने व उनके समाधान खोजने की दिशा में बढ़ पाने का उत्साह बिखेरता हुआ नजर आया। यह पूरी प्रक्रिया एक बार फिर यह अनुभव कराती है कि बच्चे स्वाभाविक रूप से बाल वैज्ञानिक की भूमिका में होते हैं। वे अपने काम की प्रक्रिया को वैज्ञानिक शैली में बस कह नहीं पाते हैं  अन्यथा समस्याओं पर रचनात्मक ढंग काम करने व उनके हल ढूँढ़ पाने की प्रक्रिया में उन्हें बार-बार देखा जा सकता है। अलग-अलग तरह की जुगाड़, कई-कई बार प्रयास करके देखना, असफल होने पर फिर एक नई कोशिश के लिए तैयार हो जाना, इतना धैर्य और उत्साह ! हमें सभी को एक नई उर्जा देता है।

कई बार सारी चीजों के बारे में हम ऐसे ही मानकर हम कुछ गहरे विश्वास बना लेते हैं, और शायद हम इन चीजों के बारे में कभी सोचते ही नहीं कि ऐसा क्यों होता है ? पर कई बार बहुत सारी बातों को लेकर मन में ये भी सवाल आता है कि हम जो सोच रहे हैं क्या यह बिलकुल ठीक है? या कहीं हम गलत तो नहीं सोच रहे हैं? जब हम ऐसी उलझन में हो पर तब हमें क्या करना चाहिए !

दुनिया की हर चीज के बारे में हमें ठीक-ठीक पता चल जाएगा ऐसा वादा तो नहीं कर सकते, पर हमारे आसपास की बहुत-सी चीजों के बारे में तो हम कुछ छोटे–छोटे प्रयोग करके पता कर सकते हैं कि हमारा विश्वास कितना सही था। आसपास मिलने वाली चीजों से प्रयोग करके, हम यह जान पाए कि क्या साबित हो रहा है, व अपने निष्कर्ष खुद ढूँढ़ पाए यही तो विज्ञान है। ऐसे तरीकों से जीवन में विज्ञान सीखते रहने को मजेदार बनाया जा सकता है। कुछ इसी सोच को बच्चों तक पहुँचाने के लिए रोचक प्रयोगों के माध्यम से खुद करके सीखने की प्रक्रिया में ले जाने के लिए ऐसे अवसर मददगार हो सकते हैं। जहाँ हम खुद कुछ करके देखते हुए, आपस में बातचीत करें। एक-दूसरे की यह समझने-समझाने में मदद करें कि क्या हो रहा है ? और ये भी पता लगाने की कोशिश करें कि आखिर ऐसा ही क्यों?  हो सकता है उसी समय हम हर चीज के बारे में बिलकुल सही-सही पता न कर पाएँ, पर मिलकर सही जबाब ढूँढ़ने की दिशा में हमारी ये बातचीत हमें थोड़ी मदद जरूर करेगी। शायद हमारी कोशिश कामयाब हो जाए!

इस तरह की प्रक्रियाओं से उम्मीद है कि हम सब विज्ञान के प्रति एक नई सोच और सीखने के इन मजेदार अनुभवों को बच्चों के जीवन का हिस्सा बना पाएँ।


अलका तिवारी, अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल,टोंक, राजस्‍थान

 

 

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