गणित की वैज्ञानिक समझ: साकार से निराकार की ओर

जी.एस.जयदेव

मैं वास्तव में गणित से नफरत नहीं करता। पर लम्बे समय तक मैं यह मानता रहा कि कई विभिन्न कारणों से मुझे इस विषय से नफरत थी। सबसे ठोस कारण तो वह विधि थी जिससे गणित पढ़ाया जाता था। खासकर तानाशाह अध्यापक और उसकी छड़ी ने गणित को बहुत डरावना विषय बना दिया था। लगभग चालीस वर्ष बाद पीछे मुड़ कर देखने के बाद मुझे समझ में आया कि गणित को अच्छे से सीखने के लिए मैं निश्चित रूप से काबिल था। यह मेरा दुर्भाग्य रहा कि स्कूल में हर दूसरी घटना मुझे यह मानने को मजबूर कर देती थी कि मैं कभी गणित नहीं सीख सकता। इसमें मेरे सभी शुभचिन्तकों की गहरी सहानुभूति भी शामिल थी।

क्या गड़बड़ी हुई? असल में इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। संख्याएँ कभी भी किसी वास्तविक स्थूल वस्तु को नहीं दर्शाती थीं। वे तो बस चिन्ह थीं जो जीवन से रहित शून्य में किसी जटिल पहेली के अलग-अलग हो गए टुकड़ों की भाँति तैरती रहती थीं। उन्हें एक साथ रखना क्यों ज़रूरी था, इसका कोई कारण पता नहीं था, और यदि रख भी दी जातीं तो भी वे पहले की तरह ही प्राणहीन बनी रहतीं।

विज्ञान का उत्साही विद्यार्थी होने के कारण मैंने बाद में अपने कॉलेज के दिनों में गणित की महत्ता को महसूस किया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यदि यह मुझे रोजमर्रा के जीवन के अनुभव से जुड़ी किसी चीज़ की तरह सिखाया गया होता तो शायद मैंने इसे सीख लिया होता।

अपने इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए, अब मैं अपने साथियों के साथ चामराजनगर के दीनबन्धु स्कूल में गणित को बच्चों के लिए अत्यधिक मज़े और मस्ती के साथ सीखने का असली अनुभव बनाने की कोशिश कर रहा हूँ। गणित के पाठ जीवविज्ञान के भेष में प्रस्तुत किए जाते हैं जिससे अनुभव में जीवन्तता आती है।

अलग-अलग प्रकार के द्विबीजपत्रीय बीजों को काँच के जारों में बोया जाता है, ताकि बच्चे एक ही साथ जड़ों और तनों की वृद्धि का अवलोकन कर सकें। बीज फलियों, मटर, हरे चने आदि के होते हैं। प्रतिदिन बच्चे जड़ों और तनों की वृद्धि को मापते हैं, उसको दर्ज करते हैं। यह देखना रोचक होता है कि शुरुआत में कुछ दालों की जड़ें अपने अंकुरों की तुलना में ज्‍यादा तेजी से बढ़ती हैं, जबकि लगभग एक हफ्ते में अंकुर जड़ों से ज्‍यादा बढ़ जाते हैं।

अवलोकन और दर्ज करने की प्रक्रिया बच्चों को ठीक-ठीक मापने और आँकड़े दर्ज करने के कौशल सीखने का मौक़ा देती है। वे किसी जैविक क्रियाकलाप में विभिन्न संरचनाओं (पैटर्न्स) को पहचानना भी सीखते हैं। साथ ही साथ समान परिस्थिति में परिणामों का अनुमान लगाना भी सीखते चलते हैं। जीव विज्ञान के इस प्रयोग के द्वारा हम गणित से महत्वपूर्ण सम्बन्ध भी स्थापित कर पाते हैं। सेंटीमीटर में दर्ज की गई जड़ों और अंकुरों की वृद्धि संख्याओं के रूप में ही होती हैं। पर ये संख्याएँ निर्जीव नहीं होतीं बल्कि ये किसी जीवन्त घटना को दर्शाती हैं। इन आँकड़ों का इस्तेमाल करते हुए बच्चों ने बार आलेख और रेखा आलेख बनाए। इन आलेखों ने बच्चों के बीच बहुत ही सक्रिय चर्चा के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। कई प्रश्नों के तैयार उत्तर नहीं थे। इससे हमने यह सीखा कि विज्ञान हमेशा उत्तरों के बारे में नहीं होता, बल्कि उसे ऐसे प्रश्नों के चारों ओर भी बुना जा सकता है जिनके उत्तर कक्षा की परिस्थितियों में तुरन्त नहीं दिए जा सकते।

बार आलेख और रेखा आलेख के बारे में एक प्रश्न था। यदि बार आलेख सब कुछ समझा देता है तो हमें रेखा आलेख की जरूरत क्यों होती है? बच्चों को इसका उत्तर स्वयं ही खोजने दिया गया। एक बच्चे ने शीघ्र ही जान लिया कि जहाँ एक ओर बार आलेख घटना की पूरी तस्वीर दिखाता है, वहीं रेखा आलेख प्रेक्षण की अवधि के दौरान हुए परिवर्तनों पर प्रकाश डाल सकता है। इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला गया कि वक्र आलेख ने केवल अन्तिम परिणाम बताने के बजाय प्रक्रिया को भी प्रतिबिम्बित किया।

यह कहने की जरूरत नहीं कि इस प्रयोग में आई संख्याओं ने एक अविस्मरणीय क्रियाकलाप को प्रदर्शित किया। इस कारण इन “जीवन्त बन गई संख्याओं” की सहायता से गणितीय समझ को और बढ़ाया जा सकता है। उन्हीं अंकों का इस्तेमाल अनुपात सीखने के लिए भी किया गया। इन अंकों से जड़ों और तनों की वृद्धि का अनुपात निकाला जा सकता है। यहाँ फिर, अनुपात का अर्थ किसी घट रही क्रिया से जुड़ा रहता है, और इसलिए यह मात्र निर्जीव संख्याओँ का खेल नहीं होता।

अनुपात की अवधारणा को समझने के लिए इसी तरह के अन्य प्रयोग करवाए गए। उदाहरण के लिए बच्चों ने एक अभ्यास किया जिसमें उन्हें अलग-अलग आयु-वर्गों के बच्चों के सिर और शरीर की लम्बाई को मापना था। सिर की लम्बाई बहुत ही जल्दी, कहें कि छह या आठ वर्षों में अपने अधिकतम तक पहुँच जाती है। हालाँकि शरीर 18 वर्ष की उम्र तक बढ़ता रहता है। स्कूल के शिक्षकों के सिर और शरीर की लम्बाई को भी मापा गया। इस प्रयोग में भी संख्याएँ निर्जीव नहीं थीं। साथ ही साथ हमने इस पर भी बहस की कि सिर अपनी अधिकतम लम्बाई तक इतनी कम उम्र में विकसित क्यों हो जाता है। जन्म के समय कितनी तंत्रिका कोशिकाएँ रहती हैं? क्या व्यक्ति के पूरे जीवन काल में तंत्रिका कोशिकाएँ बढ़ जाती हैं?

प्राथमिक स्कूल के स्तर पर गणित की ऐसी वैज्ञानिक समझ बच्चों को ठोस नींव प्रदान करती है। इससे वे अपनी शिक्षा के बाद के चरणों में ऊँचे दर्जे के, ज्‍यादा जटिल और निराकार गणित तथा विज्ञान को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

 

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जी.एस.जयदेव ने 1992 में दीनबन्धु ट्रस्ट (http://www.deenabandhutrust.org) की स्थापना की थी। वर्तमान में उनका दल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ के साथ मिल कर कर्नाटक के चामराजनगर जिले में प्राथमिक शिक्षा के सुधार के लिए काम कर रहा है। उनसे सम्पर्क करने के लिए ईमेल है: gsjaydev@rediffmail.com

मूल लेख अँग्रेजी में है और अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन के  न्यूजलैटर लर्निंगकर्व के अप्रैल,2009 अंक में प्रकाशित हुआ है। यह अंक विज्ञान शिक्षा पर केन्द्रित है। अनुवाद: सत्येन्द्र त्रिपाठी

 

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