गणित की कक्षा के कुछ अनुभव

गणितीय अवधारणाओं को ठीक से समझने के लिए आवश्यक है कि बच्चे अंकों, संख्याओं व संबोधों को मूर्त रूप में ज्यादा से ज्यादा देख समझ पाएँ। अपने पिछले शैक्षिक अनुभवों के आधार पर मैं यह कह सकती हूँ कि कई बार मैंने यह सोचकर कि गणितीय संबोधों को मूर्त रूप में दिखाने या सवाल हल करने में समय की फिजूलखर्ची होगी, अपना पूरा कौशल व श्रम सिर्फ श्यामपट्ट, चाक, कापी-पैंसिल या किताब तक ही सीमित रखा। लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ कि इस तरीके से कक्षा के सभी बच्चों को अवधारणा समझ में आ गई।  इसमें बच्चों के सीखने की गति पूर्वज्ञान और अनुभव अमूर्त चिन्‍तन की दक्षता आदि कारक तो शमिल थे ही पर गणित जैसे अमूर्त विकास की नींव कैसी बनी थी अर्थात शुरुआत किस तरह से हुई  थी बहुत बड़ा कारक था। शिक्षण में जैसे-जैसे अनुभव बढ़ते गए मेरी इस विचार में दृढता बढ़ती गई, कि गणितीय अवधारणाओं की स्पष्ट व मजबूत समझ बनाने के लिए प्रारम्भिक कक्षाओं में स्थूल वस्तुओं का उपयोग व उनके बारे में बातचीत ही पक्की नींव का कार्य करती है। यहाँ पर मैं इस बात पर जोर देना चाहूँगी कि भाषा की कक्षा में किया गया मूल कार्य अर्थात समझकर पढ़ना-लिखना व स्वयं की कल्पना से चीजों को समझकर व्यक्त कर पाना (मौखिक, लिखित दोनों तरीकों से) किसी भी अन्य विषय को समझने की पहली कड़ी है। मेरे विद्यालय के सम्‍बन्‍ध में मैं भाषा का प्रयोग हिन्दी भाषा के लिए कर रही हूँ।

कई बार हम गणित को सिर्फ अंकों व चिन्हों का खेल समझने की भूल कर लेते हैं। इन्हीं प्रक्रियाओं का लगातार अभ्यास करवाते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि जैसे ही अभ्यास कार्य में कमी आती है, सवालों को हल करने में होने वाली गलतियाँ बढ़ती जाती हैं। और कई बार यह भी होता है कि सवाल बच्चों के सिर के ऊपर से गुजर जाता है और हम ठगे से रह जाते हैं कि हमने तो बहुत मेहनत से इन सवालों पर पर्याप्त अभ्यास कार्य करवाया था फिर बच्चे ये सवाल हल क्यों नहीं कर पा रहे ? हमारे प्राथमिक विद्यालयों में दुर्भाग्यवश विभिन्न कारणों से सवालों का गणितीय रूप में अर्थात् संख्याओं व चिन्हों के आधार पर ही ज्यादातर अभ्यास कार्य करवाया  जाता है परिणाम स्वरूप कई बार विभिन्न गणितीय अवधारणाएँ किसी शृंखला (चेन) की तरह आगे नहीं बढ़ती बल्कि यहाँ-वहाँ बिखरी दिखाई पड़ती हैं। वे एक-दूसरे से सह-सम्बन्ध स्थापित करती नहीं दिखाई पड़तीं। बच्चे जोड़,घटाना, गुणा भाग व अन्य अवधारणाओं को एक-दूसरे से जुड़ता हुआ न देखकर अलग-अलग व सवाल हल करने के जटिल व कठिन स्तरों के रूप में देखते हैं। कक्षा में बच्चों की प्रतिक्रिया, ‘कितना कठिन सवाल है यह’ के रूप में व्यक्त होती है।

शिक्षिका के रूप में कार्य करने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि लगातार सीखने-समझने की सम्‍भावना बनी रहती है। अपने पिछले 12 वर्षों के कुछ शैक्षिक अनुभवों को मैं आपके साथ साझा करना चाहती हूँ जिन्होनें गणितीय सम्‍बन्‍धों को समझने में मेरी मदद की।

बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृति का विकास करना

विभिन्न शोधों के आधार पर यह बात साबित हुई  है कि 7-11 वर्ष के अन्तराल में बच्चों में रचनात्मकता का विकास होता है। इससे पहले बच्चा अपने पूर्व अनुभवों अर्थात् अपनी भावनाओं, कल्पनाओं व भाषा के उपयोग से चीजों व घटनाओं को समझाना प्रारम्भ कर चुका होता है। अब वह अपनी इन्हीं दक्षताओं के आधार पर सीखता हुआ नवीन ज्ञान का सृजन करता है। इस उम्र में एक सृजनकार के रूप में विकसित होता है। यदि उसे उपयुक्त वातावरण मिले तो वह अपनी इस दक्षता का उच्चतम विकास कर पाने में सक्षम होता है। लगभग इसी उम्र के बच्चे प्राथमिक विद्यालय में होते हैं। बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृत्ति का विकास हो सके, इसके लिए मैंने बहुत सी गतिविधियों का उपयोग किया। उदाहरण स्वरूप समग्र भाषा शिक्षण पद्धति अपनाना जिसमें भाषा सीखने के लिए अक्षरों के बजाए, चित्रों शब्दों व वाक्यों से शुरुआत की जाती है। विभिन्न अभ्यास कार्य करवाना जैसे किसी चित्र या विषय पर बच्चों से बातचीत करना, बातचीत के मुख्य बिन्दु लिखना व पढ़ना, ढेर सारी कहानियाँ, कविताएँ बच्चों के साथ मिलकर पढ़ना। उन्हें अपनी मौलिक कविता-कहानी लिखने को प्रेरित करना, पुस्तकालय का भरपूर उपयोग करना, पुस्तकालय का उपयोग पाठ्यपुस्तकों के साथ करना, बच्चों के मौलिक लेखन को आपस में साझा करने के लिए प्रार्थना सभा में स्थान देना, उनकी रचनाओं से दीवार पत्रिका, बाल पत्रिका बनाना, उसको डिस्प्ले करना व बच्चों को उसे पढ़ने को प्रेरित करना। बच्चों के मौलिक लेखन को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में जैसे चकमक, बाल प्रहरी, आदि में प्रकाशन हेतु भेजना, बच्चों की पढ़ी व लिखी सामग्री पर उनसे बात करना आदि प्रमुख रही।

इन गतिविधियों को करने का परिणाम यह रहा कि बच्चों ने जो पढ़ा-लिखा, उन्हें उसके बार में ठीक-ठीक पता था। पढ़ना-लिखना उनके लिए मशीनी प्रक्रिया नहीं बल्कि अनुभव जनित प्रक्रिया बनी, इससे उनमें स्वयं पढ़ने-लिखने की आदत का विकास हुआ।

बातचीत व कहानियों से गणितीय संबोध सिखाने की शुरुआत

कक्षा 1 व 2 के बच्चों को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से गणितीय संक्रियाएँ को सिखाना प्रारम्भ किया। चूँकि छोटे बच्चों के लिए प्रत्येक वस्तु एक पात्र होती है, वे आसानी से कहानी को छोटे-छोटे पत्थरों (कंकड़ों या मनकों) की घटती-बढ़ती संख्या या कागज के रूपये, पैसे को खेलने से जोड़ पाए। 1 से शुरू कर 10, 20 या 100, 200 कंकड़ों या मनकों की पंक्ति बनाना, उन्हें ऊँगली लगाकर गिनना, विभिन्न आकृतियों पर कंकड़ सजाना व उन्हें गिनना, 5-5, 10-10 की पंक्तियाँ या ढेर बनाना, चीजों को बाँटना या ज्यादा कम करना, जैसे खेलों ने बच्चों को संबोधों का सह-सम्बन्ध या अन्तर करना सिखाया। इस दौरान हुई बातचीत ने उन्हें सीखे हुए को सुदृढ़ बनाने में मदद की। इसी के साथ शुरू हुई  कापी पर अंकों को लिखने व चिन्हों के साथ संक्रियाओं को हल करने की शुरुआत। अब बच्चे कहानी के साथ खेल रहे थे और अपनी बातचीत को अपनी कापी पर गणितीय रुप में लिख भी रहे थे। किसी आकृति पर कंकड़ या मनके सजाते हुए या एक लम्बी पंक्ति बनाते हुए जब वे गिनने की प्रक्रिया कर रहे थे तो देख पा रहे थे कि 5 से 15 तक पहुँचने के लिए कितने अंक और बढ़ना पड़ता है। 8 या 15 के बीच कितना अन्‍तर होता है।

इसी प्रकार बातचीत करते हुए जोड़, घटाना, गुणा व भाग की संक्रियाओं को हल करने की शुरुआत हुई जो पहले वस्तुओं के प्रयोग के साथ फिर कापी पर अंकों व चिन्हों के प्रयोग के रूप में साथ-साथ चली, इससे बच्चे किसी संक्रिया को मूर्त रूप से भी देख पाए और अमूर्त के रूप में भी समझने की ओर आगे बढ़े।

उदाहरण : तुम्हारे पापा ने तुम्हें दो टाफी दीं, दो टाफी भैया ने दीं, बताओ तुम्हारे पास कितनी टाफी हुईं। या माँ ने तुम्हें दो चाकलेट दीं, तुम्हारे पास 5 चाकलेट हो जाएँ इसके लिए माँ को तुम्हें कितनी चाकलेट और देनी होंगी?

जब कक्षा 1, 2 में या आवश्यकता पढ़ने पर बड़े बच्चों के साथ भी कंकड़ों के माध्यम से इस तरह की बातचीत की जाती है कि ये पाँच कंकड़ों की पंक्ति है। इनको क्रम में लगाने से ये पत्थर पाँचवाँ पत्थर है। दूसरी ओर से गिनने पर ये वाला पत्थर पाँचवाँ पत्थर है और ये सब मिलाकर 5 हैं, तो बच्चे को बहुत सारी चीजें एक साथ समझ आती हैं। क्रम से बढ़ना, एक के बाद एक कम या ज्यादा होना, पाँच या पाँचवे में अन्तर पता चलना आदि।

उदाहरण : तुम्हारे घर में 5 मेहमान आए हैं। तुम्हें प्रत्येक मेहमान को 2-2 आम देने हैं। बताओ तुम्हें कितने आम चाहिए। या तुम्हारे पास 15 आम हैं इन्हें तुम्हें अपने 5 मेहमानों में बाँटना है, बताओ प्रत्येक को कितने आम मिलेंगे या अगर तुम्हें प्रत्येक को 4-4 आम देने हों तो तुम्हें कितने आम और चाहिए?

तुम्हारे पास 4 सेब थे, तुमने दो अपने भाई को दे दिए, तो तुम्हारे पास कितने बचे।  हम बडों की दृष्टि से ये सवाल बहुत सरल लगते हैं, पर बच्चा जब इन सवालों का हल कंकड़ों व अपने दोस्तों की मदद से निकाल रहा होता है तो मूर्त रूप से अभिनय करता हुआ, गिनता व बाँटता हुआ अपने मस्तिष्क में संख्याओं की छवि बनाता चलता है, गणितीय चिन्ह व संख्याएँ आत्मसात करता चलता है। इस तरह से की गई, गणित की शुरुआत बच्चों की समझ को पुख्ता करती है, और उनमें स्थायी ज्ञान का निर्माण करती है।

मैजिक कार्ड्स का उपयोग करना

स्थानीय मान की समझ बनाने के लिए इकाई से लेकर करोड़ तक की संख्या के कार्ड बहुत मदद करते हैं। संख्याएँ बनाते हुए जब बच्चे 100 और 5 के कार्ड को मिलाकर 105 बनाते हैं तो वे अंकों की जगह को समझते हैं। वहीं संख्याएँ बनाते हुए तब तक संख्‍याएँ सही नहीं बनती जब तक कि सभी कार्ड सही जगह पर एक दूसरे के ऊपर ना रखे हों। कार्ड जमा करके संख्‍याएँ बनाने के खेल में बहुत-सी अन्य गतिविधियाँ करवाई जा सकती हैं।

(क) अलग-अलग संख्‍याएँ बनाना व उनमें सबसे बड़ी व सबसे छोटी संख्या पहचानना।

(ख) कार्ड की मदद से स्थान बदल-बदलकर नई-नई संख्‍याएँ बनाने।

(ग) आरोही व अवरोही क्रम में लगाना।

(घ) सबसे बड़ी संख्या से सबसे छोटी संख्या घटाना।

(ड) अलग अलग बच्चों के पास अलग अलग संख्या कार्ड हैं। जो संख्या श्यामपटृ पर लिखी है, या मैंने बोली हैं, वह संख्या मिलकर बनाना, उदाहरण  5326 बनाने के लिए, वे बच्चे आगे आएँगे जिनके पास 5000, 300, 20 व 6 के कार्ड होंगे।

इसी तरह के कार्ड बनाने की आवश्यकता तब लगी जब कुछ बच्चों ने एक सौ तीन को 103 की बजाए 1003 लिखा।

कई बार कक्षा 4 व 5 के कुछ बच्चे भी उन संख्याओं को लिखने में गलतियाँ कर देते हैं, जिनमें किसी स्थान पर शून्य भी होता है। ऐसे में समझ आता है कि स्थानीय मान की समझ बनाने के लिए इस अंक का मान हजार है और इसका इकाई है और ये दोनों मिलकर 6001 बना रहे हैं, कहने से काम नहीं चलता। शुरू में बच्चों को कार्ड या रंगबिरंगे मनकों से समझने की आवश्यकता होती है। जब बच्चे खुद कार्ड बनाकर या मनके चुनकर संख्‍याएँ बनाते हैं तो वे उनके स्थान के मान को समझ रहे होते हैं।

जिन बच्चों के साथ कक्षा 1, 2 में अवधारणों के ठीक तरह से काम हुआ होता है, वे ही बच्चे कक्षा 3,4,5 की दक्षताओं पर काम कर पाते हैं। कक्षा 3,4,5 में पाठ्यक्रम के अनुसार काम शुरू करने के लिए बुनियाद तैयार होना बहुत जरूरी होता है क्योंकि अब संक्रियाएँ थोड़ी बड़ी व जटिल होती जाती हैं, ऐसे में पूर्व में बनी समझ अगर स्पष्ट नहीं है तो नवीन अवधारणाओं को समझने में बाधाएँ आती हैं।

गणित क्रम व पैटर्न का खेल है, इसमें संबोध एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, बिना पहला स्टेप पूरा किए सीधे दूसरे या तीसरे स्टेप पर नहीं जा सकते।

संख्या ढूँढो सवाल बनाओ

कक्षा 3,4,5 को स्वयं सवाल बनाकर लाने को कहने पर पता चला कि बच्चे जानबूझकर छोटी संख्याओं से सवाल बना रहे हैं? बड़े बच्चे भी भले ही 7,8 अंकों की संख्या लिख रहे हैं, पर वे अंकों को 4,5 से बड़ा नहीं लिख रहे। इससे ये बात समझ में आई  कि बच्चों में बड़ी संख्या या हासिल लेने के लिए डर है। उन्हें डर है कहीं उनका सवाल गलत न हो जाए। एक दिन जब कक्षा 3 में जोड़ के कुछ सवाल श्यामपटृ पर लिख रही थी तो कुछ बच्चे पूछने लगे कि हासिल वाले सवाल हैं या बिना हासिल वाले। बच्चों को हासिल वाले सवालों से इतना डर क्यों लगता है ?

एक और समस्या कक्षा 4 व 5 के कुछ बच्चों के साथ आई, जब मैंने उन्हें दो अलग-अलग संख्याओं को देकर घटाने का इबारती प्रश्न बनाने को कहा तो कुछ बच्चे बड़ी व छोटी संख्या में अन्तर नहीं कर पाए। उन्हें समझ नहीं आया कि किस संख्या को पहले लिखें किस को बाद में। उन्होंने बिना समझे पहली संख्या को पहले लिखकर उससे दूसरी संख्या को घटाने का प्रयास किया व जहाँ तक संख्या घटी उसे घटाकर छोड़ दिया।

उदाहरण  

एक और समस्या आई जब चार-पाँच अलग-अलग संख्या देकर जोड़ने के सवाल में कुछ बच्चों ने संख्याओं को गलत लगाकर जोड़ दिया और ये ध्यान भी नहीं दिया कि इतनी बड़ी संख्या में उत्तर कैसे आ सकता है? उदाहरण  20, 402, 7, 27, 3205 को जोड़ना।

जब बच्चे कक्षा 4,5 में इस तरह की गलतियाँ करते हैं तो यह बहुत ही खीझ और गुस्सा दिलाने वाली घटना होती है। लगता है इतनी छोटी-छोटी बातें बच्चे क्यों समझ नहीं पा रहे।

हालाँकि एक बार ध्यान दिलाने पर बच्चों को अपनी गलती का तुरन्‍त पता चल जाता है पर कुछ दिनों बाद पुनरावृति करने पर कुछ बच्चों के साथ फिर से ऐसी समस्याएँ आती हैं। ऐसे में पूरी कक्षा को एक साथ लेकर किसी नयी अवधारणा पर काम करना मुश्किल होता है।

वे क्या कारण होते होगें जिनसे बच्चे संख्याओं व संक्रियाओं को समझ नहीं पाते, उन्हें संख्याओं से खेलने का मन नहीं करता उनका ध्यान उनके बड़े आकार या मान की तरफ नहीं जाता ? जब मैंने इस दिशा में सोचना शुरू किया तो पाया कि स्थानीय मान की समझ न होने के अलावा इसका एक प्रमुख कारण बच्चों में संख्याओं का उपयोग करने हेतु कोई उत्साह नहीं होना भी है। वो उत्साह जो उन्हें कहानी या कविता की किसी किताब को पढ़ने में आता है। वो उत्सुकता जो उन्हें पुस्तकालय में जाने की होती है, गणित की किताब देखते ही भय में क्यों बदल जाती है?

अपने आसपास देखकर मुझे कुछ संख्या बताओ पूछने पर जब बच्चों ने दो-चार संख्‍याएँ ही बताईं तो मुझे घोर निराशा हुई। बच्चे क्यों नहीं संख्याओं को खोज पा रहे। बच्चों का ध्यान संख्या की ओर आकर्षित करने के लिए मैंने अगले कुछ दिन व्यवहारिक अभ्यास करने का निश्चय किया, दरअसल गणित की मुख्य समस्या यही है, किताबी संक्रियाओं को व्यवहार में न उतार पाना।

हमने अपने काम की शुरुआत संख्या ढूँढ़ने से की और चीजों को गिनना शुरू किया। जैसे हमारे विद्यालय में कितने कमरे हैं, तुम्हारी कक्षा में कितने चार्ट लगे हैं, कक्षा में कितनी लड़कियाँ और कितने लड़के हैं? क्यारी में फूलों के कितने पौधे लगे हैं? आदि।

पहले दिन बच्चों ने सिर्फ संख्‍याएँ खोजी। विद्यालय में भी और घर में भी।

दूसरे दिन कक्षा में संख्याओं को और विस्तार से खोजा गया। आपस में बातचीत कर संख्‍याएँ ढूँढी गईं। जिसके लिए कुछ बिन्दु बनाए जैसे तुम्हारी उम्र कितनी है, तुम कितने भाई-बहन हो, तुम्हारे दोस्त की उम्र कितनी है, मैंने बच्चों से कहा वे दो-दो के जोड़े में एक-दूसरे से ऐसे सवाल पूछें जिससे उन्हें संख्‍याएँ मिलें।

घर से संख्‍याएँ ढूँढ़ने के लिए भी कुछ प्रश्न बनाए।

जैसे तुम्हारे घर में कितने सदस्य हैं, उनमें महिलाएँ कितनी हैं, व पुरूष कितने हैं, बड़े कितने, बच्चे कितने? कौन कहाँ तक पढ़ा-लिखा है, उनकी उम्र कितनी है, आदि।

बच्चे घर से ये सारी जानकारी एकत्रित करके लाए।

जब हमारे पास बहुत सारी संख्‍याएँ एकत्रित हो गईं तो इनसे सवाल बनाने की प्रक्रिया शुरू की। कुछ सवालों के उदाहरण स्वयं बच्चों को दिए व उन्हें नए सवाल बनाने को प्रेरित किया। अब बच्चों के पास संख्‍याएँ थीं व उन संख्याओं से सवाल बनाने थे। बच्चों को इसमें मजा आया वे सवालों के पैटर्न पहचानने लगे, संक्रियाओं का आपसी सम्बन्ध पहचान झटपट नए सवाल बनाने लगे उनमें एक-दूसरे से ज्यादा सवाल बनाने की होड़ होने लगी साथ ही एक-दूसरे के बारे में जानने की उत्सुकता होने लगी। गणित उन्हें अपने स्वयं के जीवन व घर में आसपास नजर आने लगा। सवाल तैरने लगे। बच्चों ने अपनी घर परिवार में एकत्रित हुई संख्याओं पर 25-30 सवाल बनाए।

जैसे- तुम्हारी माँ की उम्र कितनी है?

तुम्हारी उम्र कितनी है?

तुम्हारी माँ और तुम्हारी उम्र में कितना अन्‍तर है?

विद्यालय व घर से सवाल बनाना शुरू करके हमने अपने आसपास संख्‍याएँ एकत्रित की। कुछ बच्चों के साथ मिलकर मैंने कुछ टहनियाँ एकत्रित की। बच्चों ने उन टहनियों पर लगे पत्तों की संख्या गिनी व उन पर सवाल बनाए।

जैसे सबसे ज्यादा पत्ते किस टहनी पर लगे हैं? सारी टहनियों को मिलाकर कितने पत्ते हैं?

अभी मैं यह सोच ही रही थी कि क्या यह तरीका काम करेगा ? बच्चों का गणित की कक्षा में मन लगेगा। उनका संख्याओं के प्रति उत्साह जागेगा कि बच्चे स्वयं अपनी वस्तुओं व आसपास की चीजों पर सवाल बनाकर दिखाने लगे जैसे कि गणित की किताब में 187 पेज है, हिन्दी की किताब में 144 पेज है। बताओ किसके पेज ज्यादा हैं? और कितने ? दोनों किताबों के पेज मिलाकर कितने पेज हैं? अगर इसमें संस्कृत की किताब के पेज भी मिला दिए जाएँ तो कुल कितने पेज हो जाएँगें? इस तरह के सवालों को हल करने के बाद मैंने बच्चों का ध्यान सवाल बनाने के कुछ पैटर्न की तरफ दिलाया जिससे हम स्वयं उन सवालों को बना सकें व अभ्यास कर सकें।

जैसे घटाने के बड़े सवाल बनाना जिनमें बार-बार हासिल लेना पड़े, कैसे बनाएँगें ?इसी के साथ बच्चों से दुबारा हासिल की अवधारणा व आवश्यकता पर भी बात की। उन्हें संख्या कार्ड बनाना सिखाया, बच्चों ने इकाई से लेकर करोड़ तक की संख्या के कार्ड स्वयं बनाए व उनसे खूब खेला।

बच्चों ने अपनी चीजों, स्कूल, घर व आसपास खूब सारे पैटर्न ढूँढे। संख्याओं से तरह-तरह के पैटर्न बनाए। बच्चों को सवाल करना अच्छा लगे, उनका आत्मविश्वास बढ़े  इसके लिए उनसे कक्षा 1, 2, 3 व कक्षा 5 से 1, 2 , 3 व 4 की गणित की किताब से सवाल हल करवाए। बच्चों ने यह गतिविधि दो तरह से की। वे सवाल जिनका हल उन्होंने मौखिक रूप से निकाला और वे सवाल जिन्हें कापी पर हल करना पड़ा। इन सवालों को हल करते हुए उन्होंने यह भी जाना कि वे कितने तरह के सवाल हल कर पा रहे हैं और उन्हें कहाँ परेशानी हो रही है। बच्चों का संकोच खत्म हुआ वे यह कहकर सवाल दिखाने आए कि मुझे इतने तरह के सवाल करने आ गए हैं पर यहाँ पर कठिनाई आ रही है। जिन बच्चों ने जल्दी-जल्दी काम किया उन्होंने बाकी बच्चों की मदद की। इस तरह काम करने से सारी समस्याएँ तो खत्म नहीं हुई पर गणित की कक्षा का माहौल जरूर बदल गया। बच्चों में सवालों का हल खोजने की इच्छा जगी। मेरा भी खुद पर आत्मविश्वास बढ़ा।

ये बात सही है कि गणित में हम प्रत्येक चीज को स्थूल रूप में नहीं दिखा सकते, हमें कल्पना करना व अमूर्त में देखना महसूस करना आना चाहिए। पर इस अमूर्तता को बच्चे अच्छी तरह समझ पाएँ इसके लिए प्रारम्भिक कक्षाओं में खासतौर पर कक्षा 1 व 2 में बच्चों के साथ ढेर सारी बातचीत बहुत जरूरी होती है। सिर्फ गणितीय तरीकों से जिन बच्चों के साथ सवालों को हल करने का अभ्यास करवाया जाता है वे इबारती प्रश्न हल करते हुए गलतियाँ करने लगते हैं, क्योंकि वे संबोधों को समझ नहीं पाते। उन्हें पता नहीं चलता कि इस सवाल में किस संक्रिया का उपयोग करना है?

अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे गणित में रूचि लें तो हमें उन्हें संख्याओं से खेलना सिखाना होगा, उन्हें संख्‍याएँ देखने, खोजने के लिए प्रेरित करना होगा।

इसमें कोई शंका नहीं कि हमारे अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में 2 शिक्षक होते हैं, कहीं-कहीं तो एक ही शिक्षक के भरोसे पूरा विद्यालय होता है तब इस तरह से गतिविधियों को कराने हेतु पर्याप्त समय नहीं रहता पर हमें इसी समय व संसाधनों में से कुछ तरीके निकालने होंगे।

मेरे साथ अक्सर होता है कि इन गतिविधियों में काफी समय लग जाता है। लगता है कि अब क्या होगा, क्या बाकी का पाठ्यक्रम समय पर सिखा पाऊँगी? पर आश्चर्यजनक रूप से इन गतिविधियों के बाद बच्चों के काम करने की गति व उत्साह बढ़ जाता है, और हम पाठ्यक्रम के अनुसार दी गई संक्रियाएं पूरी कर पाते हैं।

शिक्षक होने के लिए बहुत जरूरी है कि निरन्तर सीखने-सिखाने की लौ मन में जगी रहे। आज मैंने क्या सीखा और अपने बच्चों को क्या सिखा पा। ये बात रोज काम खत्म होने पर मन में उठनी चाहिए। एक बैचेनी बनी रहनी चाहिए कि बच्चे वे दक्षताऐं हासिल क्यों नहीं कर पा रहे जिनके लिए मैं इतना प्रयास कर रही हूँ। क्या बच्चों में कमियाँ हैं ? क्या मुझे मेरे तरीके बदलने चाहिए ? तभी कुछ बात बन सकती है। अपनी पिछले 12 वर्षों के शिक्षण कार्य में मैंने बच्चों के साथ बहुत कुछ सीखा है। ये सीखना जारी है।



रेखा चमोली,शिक्षिका,राजकीय प्राथमिक विद्यालय, गणेशपुर, उत्तरकाशी,उत्‍तराखण्‍ड

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Sunder2013 का छायाचित्र

मैं आपके भाषा के समग्र शिक्षण से बहुत प्रभावित हुवा हूँ और इसे अपनी विशेष कक्षा में प्रयोग करने की कोशिश कर रहा हूँ और परिणाम आशातीत हैं । आपका गणित शिक्षण पर लेख बिलकुल मौलिक और अनुकरणीय है ।

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