कोरोना काल में सामुदायिक पहल और सीखना : एक अनुभव

कोरोना महामारी काल अत्यधिक लम्बा और अनिश्चितकालीन होता जा रहा था। लोग सामान्य स्थिति को देखने के लिए तरसने लगे हैं। हालाँकि काम कुछ समय तक प्रभावित तो रहे मगर हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना प्रगतिशील मानव को अनुकूल कब तक लग सकता है? लोग अपने घर में सुरक्षित तो हैं पर आने वाले समय के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं। कोरोना महामारी के इस भयानक काल में भी उनका सोचना-समझना और योजना बनाकर आगे बढ़ने का विचार किसी तरह से रुका नहीं है। योजना बनाकर अपने काम को अच्छे से कर पाने का जज़्बा हर क्षेत्र से जुड़े लोगों के मन-मस्तिष्क में लगातार तरंगित हो रहा है।  इस महामारी के खौफ से अब लोग अपनी जानकारी बढ़ाकर कोरोना से बचने और इस पर जीत हासिल करने की तैयारी कर चुके हैं। लेकिन फिर भी बहुत सारे सवाल ऐसे हैं जिनसे सब लोग जूझ रहे हैं।

स्कूल बन्द हो जाने पर एक शिक्षक होने के नाते मैं और मेरे जैसे ही कई शिक्षक भी एक नए प्रश्न से सामना कर रहे थे – अब बच्चों को सीखने से कैसे जोड़ेंगे? वे तो सब भूल जाएँगे उनको अभ्यास कैसे करवाया जाएगा?

टोंक जिले के बमोर में अधिकांश समुदाय मज़दूरी, कारीगरी, कृषि–श्रमिक और इसी तरह के प्रतिदिन आय वाले रोजगार से जुड़ा है। ऐसे समय में उनको किस तरह के संकट का सामना करना पड़ रहा है,इसका हमेंअन्‍दाज़ा नहीं था। इसलिए   मोबाइल से बातों–बातों में सामान्य हालचाल और कुछ आवश्यकता के विषय में समझा गया। बार-बार की बातचीत से समुदाय सहज होकर अपनी हर बात को बता रहा था। इस तरह समुदाय के साथ सम्बन्धों की नजदीकी और गहरे रिश्ते की अभिव्यक्ति से हमने जहाँ न सिर्फ परस्पर जुड़ाव बनाया बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह भी किया। खाद्य सामग्री वितरण में समुदाय ने स्कूल शिक्षकों के साथ मिलकर सहयोग से सामग्री वितरण के काम पूरे किए। इससे प्राथमिक आवश्यकता पूरी हुई। अब जरूरी था बच्चों के साथ जुड़ना। यहाँ से शुरुआत हुई घर रहकर भी अपने विद्यार्थियों को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ने की।

घर पर सीखने–सिखाने की प्रक्रिया क्या हो सकती है इस पर सोच-विचार किया। अन्य सभी स्कूलों की तरह ऑनलाइन माध्यम की तूफानी लहर से सीखने–सिखाने का दौर चला। किसी शिक्षक ने व्हाटसऐप के ज़रिए कहानी सुनाई तो किसी ने गणित की पहेलियाँ भेजीं। किसी ने रोज़ की ताज़ा खबरों के सिलसिले को साझा किया। किसी ने ऑनलाइन किताबों की पीडीएफ भेजना शुरू किया और विद्यार्थियों से उनके अनुभव बाँटने को कहा। पर कुछ समय बाद ही लगने लगा कि ये तरीका तो सही नहीं है। यहाँ हम एक भूल कर रहे थे। सभी विद्यार्थियों के पास मोबाइल–इंटरनेट की सुविधा नहीं है तो न सब सीखेंगे और न सबको अवसर मिलेंगे। इसलिए अब समय था ऑफलाइन होकर काम की योजना बनाने और उसको लागू करने का।

अनलॉक होने के साथ सभी आगे–पीछे, देर–सवेर अपने कार्यस्थल पर पहुँच चुके थे। परस्पर बातचीत से योजना बनाते हुए सबने विद्यार्थियों के साथ जुड़ने के लिए रणनीति बनाई। सभी शिक्षक अपने विषय की प्रकृति और विषयगत उद्देश्यों को ध्यान में रखकर वर्कशीट बनाकर समुदाय में प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुँच गए थे। प्रत्येक विद्यार्थी को समझाते और बातचीत करते हुए उनको काम करने के लिए प्रेरित किया गया। शिक्षक भी यह सीख रहे थे कि कैसे वर्कशीट में सीखने की गुणवत्ता को बढ़ाएँ। सबने अपने विषय की अवधारणा और सीखने के प्रतिफलों (LO)को ध्यान में रखकर विद्यार्थियों के स्तर अनुसार कहानी और सार रूप में अवधारणा को सम्‍बन्धित चित्रों और कई सारे उदाहरणों के साथ रखने की कोशिश की। जिससे वे उनको अपने परिवेश से जोड़ते हुए सीख सकें। निश्चित समयावधि के बाद प्रतिपुष्टि देकर अगली अवधारणा तक पहुँचने की तैयारी हर शिक्षक कर रहा था। पर दो दौर के बाद ही रुक जाना ज्यादा ठीक लगने लगा। क्योंकि गुणवत्ता को चुनौतियों ने घेर रखा था। चुनौतियाँ थीं, सभी बच्चों की कार्य में स्वयं की स्वतंत्र संलग्नता का अभाव। कुछ बच्चे अपने बड़ों या अभिभावकों की मदद ले रहे थे, निर्धारित समय से अधिक समय लग रहा था। एक से दूसरे कार्य के लिए शिक्षक की तैयारी का समय, आदि।

सब पढ़ें, सब बढ़ें की तर्ज़ पर बच्चों को किताबों से जोड़कर भाषागत और विषयगत दायरे, परस्पर विषयों का अन्तः सम्‍बन्ध, कौशल और दक्षताओं पर कार्य करने का निश्चय किया। अब हर शिक्षक पुस्तकालय की पुस्तकों तक पहुँच बनाने और विद्यार्थियों के स्तर अनुसार उनको वर्गीकृत कर रहा था। जिसके पीछे उद्देश्य था भाषागत मुख्य कौशलों सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना को स्तरवार विकसित करना। इसके लिए सभी शिक्षक पुस्तकों को छाँटकर उनको बंडलों में विभाजित कर रहे थे। इस प्रक्रिया के लिए हमने बमोर और टोंक को 12 खण्डों में बाँटा और प्रत्येक खण्ड में बच्चों की संख्या तथा दो खण्डों पर दो शिक्षक समूह की ज़िम्मेदारी को सुनिश्चित किया गया। इसमें ज़्यादातर शिक्षक समूहों के पास दो और कुछ के पास तीन खण्ड  भी थे, पर वहाँ शिक्षक भी तीन ही थे। प्रत्येक खण्ड के लिए डेढ़ घण्टे का समय निश्चित किया। सभी ने सबसे पहले खण्ड में जाकर सीखने-सिखाने के लिए स्थान सुनिश्चित करने का काम किया। यहाँ समुदाय की भागीदारी से हम चैन की सांस ले पाए। क्योंकि मन में ये डर बना हुआ था कि कौरोना महामारी के चलते कोई स्थान देने को मना न कर दे। पर इस मामले में समुदाय का सहयोग काबिले तारीफ और सराहनीय रहा। समुदाय ने मदद करते हुए जगह का प्रबन्ध करने और यहाँ तक कि अपने घर में बैठने और काम करने की अनुमति भी दे दी। इस तरह उनका ये प्रयास हमारे लिए अनमोल उपहार जैसा ही था। लगभग एक महीने तक भी हमें काम के दौरान जगह को लेकर किसी भी तरह बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। हालाँकि बीच में छुटपुट समस्या जैसे किसी के सवाल आप यहाँ क्यों आ रहे हैं? कोरोना में अपने घर रहें। पर बातचीत से सब पार पाने जैसी ही रही। 

हमने मिलकर पुस्तकों पर जिल्द चढ़ाकर उनको लम्बे समय तक सुरक्षित रखने का काम किया। जिसमें अपनी और अपने विद्यालय की सामग्री के रखरखाव के प्रति जागरूकता और सुरक्षा को सीखने का भाव था। इस प्रक्रिया में पूर्व विद्यार्थियों ने भी अपनी भागीदारी निभाई। यह अपने आपमें समुदाय भागीदारी और जुड़ाव का अच्छा खासा उदाहरण है। इनमें सूरज और आशीष जो हमारे पूर्व विद्यार्थी हैं, ने घर पर चल रही कक्षा प्रक्रिया में जुड़ते हुए अपनी अगली कक्षा की मुख्य अवधारणाओं की समझ बनाई। साथ ही इस कक्षा के प्राइमरी स्तर के बच्चों के साथ जुड़कर सीखने की प्रक्रिया में सहयोग दिया। सूरज ने इन बच्चों के साथ गति, ऊर्जा आदि पर दैनिक उदाहरणों के माध्यम से बात की। जैसे हवा का रुख और गति को कैसे पहचानते हैं, पंखा चलता है तो इसमें कौन-सी ऊर्जा काम आती है, आदि।   साथ ही इंग्लिश स्टोरी भी सुनाई। इसी तरह प्रीति ने मुख्य भूमिका निभाते हुए सभी को कोरोना के प्रति जागरूक करने के लिए गतिविधिपरक समझ को बनाने का अच्छा प्रयास किया। बच्चों से कोरोना महामारी के विषय में पूछा। वे इस बारे में किस-किस तरह की जानकारी रखते हैं। सबको कोरोना जागरूकता नारे(स्लोगन), कविता, ज़रूरी बात लिखने का काम करने को कहा। इसमें प्राथमिक और उच्‍च प्राथमिक दोनों कक्षाओं के विद्यार्थियों ने अपनी समझ और जानकारी की अभिव्यक्ति को काग़ज़ पर उतारा। कोरोना जागरूकता रैली में इस कार्य को बतौर पोस्टर काम में लिए जाने की योजना है।

इस तरह का रचनात्मक काम कई आयामों को पूरा करता है। यह हमारे पूर्व विद्यार्थियों की तरफ से अच्छी पहल है। प्रीति ने इस काम को COVID-19 नाम से बने व्हाटसऐप ग्रुप पर भी फोटो के माध्यम से साझा किया। यह ग्रुप बमोर गाँव में जागरूकता अभियान से जुड़ा हुआ है। इस तरह के काम में सभी बच्चे अपनी अभिव्यक्ति विभिन्न माध्यमों से कर रहे थे।

विद्यालय की पूर्व छात्रा अंजली ने अपने घर बैठकर मास्क बनाए। उसने गाँव की हर दुकान यहाँ तक की हटवाड़े के नाम से लगने वाले शनिवारीय हाट में भी लगभग 40 मास्क वितरित किए। शिक्षाशास्त्र के सिद्धान्त यहाँ व्यवहार में साफ दिख रहे हैं जब सिद्धान्त क़हता है –“सीखना मतलब व्यवहार में परिवर्तन” और “सीखना मतलब पूरी तरह सीखे गए का अनुसरण”।

कुछ बच्चों ने तो कोरोना पर अपने हौसले से जीत भी पा ली थी। कक्षा 5 की खुशी ने अपनी कविता के शब्दों में साफ तौर पर कह दिया था कोरोना, कोरोना, कोरोना इतना भी परेशान मत होना। मास्क लगाना, ज़रूरत पड़े तो सेनेटाइजर लगाना। अजय कुमार चौमिया की कविता तो कोरोना से लड़ने को तैयार बैठी थी। कोरोना के बहाने सभी ने अपनी अभिव्यक्ति को सशक्त बनाया जिसकी माँग भाषा की विभिन्न विधाएँ और मौलिक अभिव्यक्ति करती हैं। हर बच्चा स्वयं, अपने परिवेश और अपने देश के प्रति चिन्तित होने के साथ-साथ भविष्य के सपने भी संजो रहा है। जिसमें कोरोना वेक्‍सीन बनने और कोरोना मुक्त देश का जिक्र है।

कोरोना में जहाँ सब रुका-रुका सा है, वहीं बच्चों के काम में कुछ नयापन है जिसमें बच्‍चे खुद से पहल करते हुए अपने आत्मविश्वास को बढ़ा रहे हैं और कुछ नया सीखकर व्यवहार में ला रहे हैं।


प्रतिभा शर्मा, अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, टोंक, राजस्‍थान

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