किताबों से शुरुआती मुलाकातें

पूजा बहुगुणा

इस लेख के माध्यम से मैं अपनी  बेटी के किताबों के साथ बिताए  शुरुआती पल आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। मेरी बेटी का नाम शुभावरी है, हम उसे प्यार से शुभा बुलाते हैं।   उसके साथ बिताए शुरुआती साल  और उनसे जुड़ी यादें मेरे लिए सीखने के सुनहरे अवसर लिए हुए थीं। इन्हीं यादों का एक अटूट हिस्सा है शुभा के साथ कहानियों की किताबें पढ़ना।  

मेरे परिवार में किताबी माहौल हमेशा बना रहा है इसके बावजूद शुभा जब भी किसी किताब को हाथ लगाती तो हममें से कोई-न-कोई उसके हाथ से किताब ले लेता और बदले में कोई खिलौना उसे पकड़ा देता। शुभा के हाथ से किताब लेने का पहला कारण शायद किताब की सुरक्षा ही रहता हो कि कहीं वह किताब न फाड़ दे। पर इसके पीछे कहीं-न-कहीं निहित हमारी यह सोच भी है कि बच्चे स्कूल जाने से पहले या अक्षर ज्ञान से पहले किताबों का करेंगे क्या। अभी उनके लिए किताबों के मायने ही क्या हैं। जब मैंने पढ़ा कि बच्चों के साथ शुरुआती दिनों में किताबें पढ़ना उनके सीखने के लिए बेहतर साबित होता है, तो तय कर लिया कि शुभा के लिए किताबें लाई जाएँ, उसके साथ मिलकर किताबें पढ़ी जाएँ। शुभा तब दो बरस की होने वाली थी। कई बार लगा कि कहीं मैं जल्दी तो नहीं कर रही, पर इन्हीं विषय पर किए गए शोध अध्ययनों ने मेरे विचार को बल दिया। बहरहाल, मैं किताबें ले आई और रोज उन्हें लेकर शुभा के साथ बैठने लगी।

पहली किताब

शुभा के लिए लाई गई पहली किताब थी, एकलव्य द्वारा प्रकाशित, वी. सुतेयेव की ‘मैं भी’। इस किताब का वह पन्ना जहाँ चूजा डूबता है और लिखा है ‘बचाओ’, शुभा को बहुत पसन्द आया। वह बार-बार उसी पन्ने को पढ़ने की जिद करती। इसके बाद तो जब भी हम दोनों यह किताब पढ़ने बैठते, शुभा पहले उसी ‘बचाओ’ वाले पन्ने को पढ़ने की जिद करती पर मेरे वयस्क विचार और अनुभव उसे पहले पन्ने की तरफ ले जाते। मैं कहती, “नहीं, हम शुरु से पढ़ते हैं।” मैं जब ऐसा करती तो वो भाग जाती। मुझे एहसास हुआ कि मैं कुछ गलत कर रही हूँ। मैंने शुभा की जिद या यूँ कहें कि मासूम चाह के आगे घुटने टेक दिए। अब वह भी मेरे पीछे-पीछे बोलती, “बचाओ।” अब मैं हर बार किताब का वही पन्ना खोलती जो शुभा को पसन्द था। जब मैं उसकी बात मान जाती तो शुभा भी मेरी बात मानती। हम दोनों मिलकर शुरु से पूरी कहानी पढ़ते।

और भी किताबें

मैं शुभा के लिए और भी किताबें लाई जैसे एकलव्य की बिल्ली के बच्चे, तुमने मेरा अण्डा तो नहीं देखा, बीज बोया; एन.सी.ई.आर.टी. की फूली रोटी, चावल, मोनी; सी.बी.टी. की प्यासी मैना। शुरुआत में शुभा के लिए किताबें भी अन्य खिलानों की ही तरह थीं। वह उन्हें उलटती-पलटती, चित्रों को निहारती, उन्हें फेंकती, कभी मेरे द्वारा किताब पढ़े जाने पर सुनती और कभी न भी सुनती। शुभा ने किताबों की उल्टा-पलटी में कई बार पन्ने भी फाड़े। जब पहली बार उसने ‘मैं भी’ का ‘बचाओ’ वाला पन्ना फाड़ा, तो मैंने गुस्से में किताबें वापस अलमारी में छिपा दीं। फिर मैंने तय किया कि किताबें सिर्फ रात में तभी निकाली जाएँ जब पढ़ना होता है। पढ़ने के बाद मैं किताबें वापस अलमारी में रख देती। इस तरह किताबें पूरा दिन अलमारी में बन्द रहतीं। किताबों की सुरक्षा के विचार ने मुझे ऐसा घेरा कि मैंने यह कदम उठाया।

मेरी किताब टूट गई

शुभा के साथ मेरा किताबें पढ़ना दिनचर्या का हिस्सा बनता चला गया, पर कहीं कुछ कमी थी। मुझे हर बार किताबें पढ़ते समय लगता कि शुभा अभी भी किताबों के प्रति वह लगाव नहीं महसूस करती। यह बात मुझे कई बार परेशान भी करती। हालाँकि, जब रात में अलमारी से किताबें निकाल कर उसे दिखाती तो वह खुश हो जाती। फिर एक दिन मैंने अरविन्द गुप्ता की कही एक बात पढ़ी कि किसी बच्चे का खिलौने के साथ सबसे बेहतर खेल होता है उसे तोड़ना। यह बात मेरे मन में बस गई और मुझे लगा कि शुभा का किताबों के पन्ने फाड़ना, उसके लिए खेल ही तो है। मैं कैसे अभी उससे एक वयस्क जैसे व्यवहार की अपेक्षा कर सकती हूँ। अगर पढ़ने और सीखने के इस प्रयास में कुछ किताबें फट भी गईं तो क्या हुआ! किताबें न फाड़ने की बात तो उसे उसी समय बताई जा सकती है जब वह किताबें फाड़ती है। मैंने फौरन शुभा के लिए लाई सारी किताबें अलमारी से बाहर निकाल दीं और तब से किताबें बाहर ही रहतीं। समय के साथ शुभा ने व्यवहार बदला। शुभा अब उन्हें फाड़ती नहीं बल्कि जब कभी कोई पन्ना फट जाता तो कहती है, “मेरी किताब टूट गई।” और उसे ठीक करवाती।

जब से किताबें शुभा की पहुँच में आईं तब से वह किसी भी समय मुझे किताब पढ़ने को कहती और खुद से  किताब चुनती। कई बार तो एक, दो, तीन किताबें बारी-बारी से पढ़ने को ले आती। जिस दिन वह किताब नहीं देख या पढ़ पाती, उस रात मुझे मासूमियत से कहती, “आज मैंने बुक नहीं पढ़ा।’

कहानियों का असर

धीरे-धीरे कहानियों की किताबों में लिखी बातें शुभा की रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बनती दिखने लगीं। जैसे शुभा फूली रोटी किताब में लिखी बातें बोलती, “मम्मी मुझे छोटी-सी लोई दे दो। देखो मम्मी की रोटी खूब फूली। मुझे जमाल की रोटी खानी है। मैंने जमाल की रोटी बनाई है।” कभी-कभी तो वह कहानी में दी गई घटना जैसा ही कुछ करने का प्रयास करती, जैसे एक रात उसने मुझे रोटी बनाते देखा, फिर मुझसे लोई माँगी और कहती है, “रोटी गोल नहीं बन रही है, कटोरी से बना दो।” कई बार तो इसी कहानी के आधार पर कुछ पंक्तियाँ भी गुनगुनाती, जो उसने खुद बुनी थीं, “जमाल की रोटी, जमाल की रोटी, फूली रोटी, जमाल की रोटी।”

पढ़ने-सा व्यवहार

समय और किताबों से जुड़े अनुभव बढ़ने के साथ-साथ, मैंने शुभा की किताबों की ओर प्रतिक्रिया बदलते या यूँ कहें, विकसित होते देखी। जहाँ शुरुआत में वह किताबों से खेलती, एक-दो शब्द सुनती, हँसती, वहीं अब वह किताबें खोल खुद ही पढ़ने लगती, मतलब पढ़ने जैसा व्यवहार दिखाती।  मैंने उसे कई बार चावल, फूली रोटी, बीज बोया, मैं भी किताबें पढ़ते देखा (pretend reading)। बहुत बार किताबें पढ़े जाने के कारण उसे किताब में लिखी कहानी पता थी। वह पन्ने खोल-खोलकर कुछ याद रही बातें, शब्द या अधूरे-से वाक्य बोलती। जैसे चावल नामक किताब पढ़ते समय वह कह रही थी, “घर पे मम्मी नहीं थीं, डब्बा खोला, चावल बनाते हैं, लाल-लाल गाजर छीली।”
ऐसा भी हुआ कि शुभा किसी और किताब के पन्ने पलटते समय भी (जो उसने नहीं पढ़ी) अपनी पढ़ी हुई कहानियाँ सुनाने लगती। जैसे एक बार वह कक्षा सातवीं की संस्कृत की किताब ऐसे पढ़ रही थी जैसे उसमें फूली रोटी कहानी लिखी हो। ऐसा ही एक और वाकया हुआ जब शुभा प्री-स्कूल जाने लगी। घर में शुभा के स्कूल से मिली हैण्डबुक रखी थी। शुभा ने किताब के मुख-पृष्ठ पर बने अपने स्कूल के लोगो को पहचानकर कहा, “ये मेरे स्कूल की बुक है।”  फिर उसने किताब के पन्ने पलटे और उन्हें कुछ इस तरह पढ़ा, “ये स्कूल मेरा है, मुझे डैडी स्कूल ले जाते हैं, बाईक पे। स्कूल में अनूपा मैम हैं, नीतू मैम हैं, पूजा आंटी भी हैं। स्कूल में गाड़ी भी होती है।” ये पंक्तियाँ शुभा ने किताब के पन्ने पलटते हुए ऐसे कहीं जैसे वह किताब पढ़ रही हो। शुभा के इस व्यवहार ने उसके अन्दर प्रिंट की विकसित होती समझ को जाहिर किया।  शुभा ने न सिर्फ किताब में बने अपने स्कूल के लोगो को पहचाना बल्कि इस समझ को भी दर्शाया कि उस किताब में स्कूल से जुड़ी बातें और वाकए ही हो सकते हैं।

किताबों से लगाव

शुभा को अपनी किताबों से इतना लगाव है कि वह उन्हें किसी दूसरे को छूने नहीं देती। हाँ, कभी-कभी अपने दोस्तों को पढ़कर सुनाने की कोशिश करती है। एक बार मैंने उसकी पसन्दीदा किताब ‘प्यासी मैना’  अपनी सहेली के बेटे को पढ़ने के लिए दे दी जो दूसरी कक्षा में था। शुभा रोज प्यासी मैना किताब को याद करती। आखिरकार मुझे वह किताब वापस लानी ही पड़ी।
प्यासी मैना किताब को पढ़ने से पहले मुझे इस किताब को लेकर बहुत-सी आशंकाएँ थीं। मैं यह किताब ले तो आई पर फिर लगा कि इसमें ज्‍यादा टेक्स्ट होने के कारण कहीं किताब की विषयवस्तु शुभा के लिए जटिल तो नहीं। इस आशंका के साथ जब मैंने पहली बार यह किताब उसके साथ पढ़ी तो मेरी आशंका से विपरीत शुभा को यह कहानी बहुत पसन्द आई। उसने कहानी के बारे में मुझसे खूब बातें कीं और सवाल भी किए।  अगली बार से वह प्यासी मैना किताब ही पढ़ने को कहती। बाद में मैंने जब अपनी आशंका के गलत होने के कारण पर विचार किया तो लगा कि शायद शुभा को इस किताब की कहानी अच्छी लगी क्योंकि उसके पास पक्षियों से जुड़े कई पूर्व-अनुभव थे। वह रोजाना घर की छत पर पक्षियों को दाना चुगते देखती है और बड़ी माँ के साथ पक्षियों के लिए एक बर्तन में पानी भी रखती है। ऐसे अनुभवों की वजह से ही प्यासी मैना की कहानी उसे बहुत पसन्द आई।

शुभा अब तीन बरस की हो गई है। उसके किताबें पढ़ने के व्यवहार में एक नई बात जुड़ी है। अब वह हर पन्ने को देखती है और ढेरों सवाल पूछती है। जैसे बिल्ली के बच्चे किताब पढ़ते समय उसने कई सवाल किए, “ये क्या है, बिल्ली क्या कर रही है,  बिल्ली कहाँ जा रही है, चूहा कहाँ भाग गया, मछली पानी में क्या कर रही है?” उसके सवालों की झड़ी किताब के एक पन्ने से दूसरे पन्ने की ओर बढ़ने में बहुत समय लगा देती है, पर इसमें मजा भी बहुत आता है। मुझे अब अधिक धैर्य रखने की जरूरत है।

किताबों के साथ शुभा की शुरुआती मुलाकातें मेरे लिए दिलचस्प होने के साथ-साथ सीखने के अवसर भी लिए हुए थीं। किताबों को पढ़ने और उन पर बातचीत करने से पढ़ने से जुड़ी कई बातें मुझे स्पष्ट हुईं। मुझे कई मुद्दों पर नए सिरे से सोचने का मौका मिला। अब लगता है कि यह विचार कि पढ़ना सीखने की शुरुआत औपचारिक शिक्षा संस्थानों में जाने पर ही करना या अक्षर ज्ञान होने पर ही करना, बच्चों की सोचने की क्षमता, पढ़ने की क्षमता और कल्पनाशीलता को कितना कमतर आँकना है। शुभा  के सीखने का यह सिलसिला आगे भी जारी रहने की आशा है।


पूजा बहुगुणा : दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय में शोध छात्रा हैं।
सभी चित्र : शिवांगी : स्वतंत्र रूप से चित्रकारी करती हैं। कॉलेज ऑफ आर्ट, दिल्ली से चित्रकला, फाइन आर्टस् में स्नातक। स्कूल ऑफ कल्चर एण्‍ड क्रिएटिव एक्सप्रेशंस, अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली से विज़्युअल आर्ट्स में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है। दिल्ली में निवास।

शैक्षणिक संदर्भ अंक 110 से साभार।

 

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