करके देखो

अलका तिवारी

पर्यावरण अध्ययन के शिक्षण की बात आती है तो हम सभी स्वीकार करते हैं कि चर्चा पर्यावरण से जुड़ी विषय वस्तुओं के बारे में समझ बनाने की एक सबसे बेहतर प्रक्रिया है। पर बात जब वंचित वर्ग के ग्रामीण परिवेश के बच्चों की हो तो आमतौर पर यह से स्वीकार किया जाता है कि इन बच्चों के पास शायद कहने के लिए ज्यादा कुछ होता ही नहीं, इसी कारण ये बच्चे शिक्षक के साथ संवाद की प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं पाते। मुझे लगता है हमें इस मान्यता के दूसरे पहलू पर भी संवेदनशीलता के साथ गौर करना चाहिए कि बच्चों के बीच संवाद की बेहतर स्थितियाँ स्थापित करने की दिशा में एक शिक्षक स्वयं को कहाँ तक ले जा पाता है। ताकि ये बच्चे  बच्चे सहज अभिव्यक्ति के पर्याप्त अवसर ले पाएँ। यह भी सोचना चाहिए कि बतौर शिक्षक क्या हम बच्चों के साथ इस खुलेपन के साथ शामिल हो पाते हैं जिसमें उनके विचार को सही या गलत ठहराने के बजाए धैर्यपूर्वक सुना जाए, ताकि बच्चे यह महसूस कर पाएँ कि उनकी बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी बाकी सबकी।  तर्क करने व् कल्पना करने के अवसर मिल पाएँ ताकि वे अपने विचारों के माध्यम से कुछ नया सृजित करने की ओर बढ़ पाएँ।  

यहाँ मैं अज़ीम प्रेमजी स्कूल,टोंक के कक्षा 5 के बच्चों के साथ किए पर्यावरण अध्ययन पर चल रहे कार्य का अवलोकन साझा कर रही हूँ। इस कक्षा में 18 बच्चे पढ़ते हैं। शिक्षक नेमाराम बच्चों के साथ बड़े ही सहज ढंग से पर्यावरण अध्ययन से जुड़े मुद्दों पर संवाद करते हैं। मैंने काफी हद तक महसूस किया है कि बच्चे अपनी आसपास की चीजों पर काफी बारीकी से गौर करते हैं, और एक स्वस्थ संवाद की प्रक्रिया से उन्हें अपने अवलोकनों को और व्यवस्थित करने आवश्यकता महसूस होती है। बार–बार के अवलोकन और पर उन विचार-विमर्श उनमें कुछ नया सृजित कर पाने की क्षमता को जन्म देते हैं। ( यह अवलोकन सितम्‍बर 2014 का है।)

आज बच्चों के साथ पर्यावरण अध्ययन की पुस्तक से ‘आओ घोल बनाएँ’ पाठ पर काम कराना था। मैं भी उत्सुक थी यह जानने के लिए कि काम की शुरुआत किस तरह होने वाली है!

पहले चरण में बच्चों से यह सवाल किया गया कि पानी में क्या–क्या डूबता है? बच्चों ने जवाब दिया : पत्थर, सिक्का, रबर......। धीरे–धीरे जवाबों की झड़ी-सी लग गई। इसी तरह अगला सवाल था कि क्या–क्या तैरता है? जवाब में बच्चे तुरन्‍त प्रतिक्रियाएँ देने लगे : कागज, पेन्सिल, पत्ती ……..। शिक्षक को प्रतीत हुआ कि बच्चों की इन प्रतिक्रियाओं को शायद और व्यवस्थित रूप देना चाहिए इसलिए बच्चों को दो समूहों में बाँट दिया। एक समूह ने डूबने वाली व दूसरे समूह को तैरने वाली वस्तुओं की सूची बनाने का काम दिया गया। दस मिनट की समयावधि में ही बच्चों का पन्ना भर चुका था, लगभग 50-60 वस्तुओं की सूची तैयार हो गई थी। अभी भी अनुमान के आधार पर वस्तुओं को चिन्हित करने की प्रक्रिया जारी थी। पर कालांश समाप्ति की बाध्यता के कारण बच्चों को रोकना ही पड़ा।

मेरे मन में यह प्रश्न था शिक्षक द्वारा यह कार्य क्यों कराया गया ? बल्कि पुस्तक के अनुसार तो विभिन्‍न प्रकार के घोल बनवाए जाने चाहिए थे। मन में इसी प्रश्न के चलते मुझे शिक्षक से इस कार्य के सन्दर्भ में संवाद करने की जरूरत लगी।  इस बारे में शिक्षक का मानना था कि घोल की अवधारणा पर जाने से पहले यह जरूरी लग रहा था कि बच्चे तैरने डूबने-की घटना को ठीक से समझ पाएँ। तभी घोल बनाने की प्रक्रिया पर जाना उचित होगा। मैं भी इस बात से कुछ हद तक सहमत सी ही थी।

अगले दिन बच्चों ने उन्हीं दो समूहों में रहते हुए काम की शुरुआत की।

  • हम डूबेंगे
  • हम तैरेंगे        

दोनों समूहों के पास अपना वही पन्ना था जिसमें उनके द्वारा कल कई सारी वस्तुओं को चिन्हित किया था। शिक्षक द्वारा सवाल किया गया कि हमने जो भी उदाहरण चुने हैं क्या आपको लगता है कि हम बिलकुल सही–सही सोच रहे हैं। इस पर सारे बच्चे अड़ गए। उनका कहना था, हाँ हमने बहुत ध्यान से सोचा है! जब शिक्षक द्वारा तीसरी-चौथी बार यह बात दोहराई गई कि अगर कुछ गलती हुई तो ? अब दो–तीन बच्चों का कहना था कि हमारी सोची हुई सारी बातें सही हों, ऐसा जरूरी नहीं है। इस पर अन्य बच्चे असमंजस में थे। शायद यह उन बच्चों की इस विचार पर मौन सहमति थी। मुझे लगा बच्चों के मन में सन्‍देह पैदा हो चुका है।

अब शिक्षक का बच्चों से सवाल था, ‘अब क्या करें जिससे ठीक–ठीक पता चल पाए कि तैरेगा कौन और डूबेगा कौन ? या फिर इस बात को यहीं छोड़ दिया जाए ?’  

बच्चे इस बात के लिए बिलकुल तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि हम सभी चीजों को पानी में डुबाकर देखें, तो सही-सही पता चल जाएगा। इस पर सहमति बनी।  बच्चों मिलकर वे सारी चीजें जुटाईं, जो उनकी सूची में थीं। और फिर जुट गए अपनी जाँच पड़ताल में। इस समय बच्चों के पास वही पन्ना था जिसमें उन्होंने अपने मन से वस्तुएँ चिन्हित की थी।  

काम की शुरुआत करते समय समूहों में बच्चों द्वारा अपनी जिम्मेदारियाँ बाँट ली गई थीं, किसी के पास पन्ने पर निशान लगाने की जिम्मेदारी, तो किसी के पास वस्तुओं को उठाकर देने, पानी में डालने, व क्या हुआ है यह ठीक से देखकर बताने की जिम्मेदारी। बच्चे पन्ने पर लिखी सामग्री को क्रम अनुसार पानी में डालते जा रहे थे व अवलोकन के आधार पर वस्तु का नाम अनुचित लगने पर उसे काटते जा रहे थे। काम करते हुए बच्चों के मन में विचार आया कि कप, मटका, थाली, बोतल आदि को डुबाने पर पाया कि ये सभी वस्तुएँ तैरती हैं पर इनमें पानी भरकर जल में डाला जाए तो क्या होगा? जब बच्चों ने ये करके देखा तो पाया पानी भरने पर तो सब चीजें डूब गई हैं। पहले से तो सब कुछ बिलकुल अलग है!

रुई के बारे में बच्चों का विचार था कि यह डूब जाएगी। पर जब इसे पानी में डाला तो बच्चों ने पाया पहले तो रुई पानी की सतह पर तैरती है, फिर जैसे-जैसे रुई में पानी भरता जाता है वैसे-वैसे रुई पानी में नीचे की ओर जाने लगती है और तल तक पहुँच जाती है। पर 10-15 सेकेण्ड की समयावधि के बाद बच्चों ने देखा कि जो रुई तली में चली गई थी वह धीरे-धीरे वापस ऊपर आई रही है, तो खुशबू और निशा ने जोर से बोलकर अपने अन्य सभी साथियों का ध्यान आकर्षित किया कि - अरे  देखो यह तो ऊपर आ रही है!! और देखते ही देखते रुई ऊपर सतह पर आकार तैरने लगी।  इस बात पर बच्चे बहुत ही विस्मित थे कि ऐसा कैसे हो गया? फिर उन्होंने शिक्षक को बुलाकर यह पूरी घटना उनके साथ साझा की। इस पर शिक्षक ने काफी धैर्य से बच्चों को बताया कि हम जो भी देख रहे हैं, उसे थोड़ी देर तक ठहरकर तो देखना ही चाहिए तभी तो हमें पता चल पाएगा कि आखिर क्या क्या हो रहा है!! इसी तरह आलू, टमाटर, नीबू, आलू का टुकड़ा, कचरी, हरी मिर्च, पेंसिल, स्केल, रबर, चीनी, आटा, कैंची आदि को भी पानी में डालते हुए अवलोकन किया गया।   जिज्ञासावश बच्चे सभी चीजों को जल्दी-जल्दी उठाकर पानी में डालते जा रहे थे, ताकि सबके बारे में तुरन्‍त जान लें। काम के दौरान मैंने देखा -

  • हम डूबेंगे समूह में बच्चे तैरने वाली वस्तुओं के नाम को अवलोकन के आधार पर काटते जा रहे थे।
  • हम तैरेंगे समूह में बच्चे तैरने वाली वस्तुओं के नाम को अवलोकन के आधार पर काटते जा रहे थे ।

अवलोकन की सूचना को दर्ज करने के लिए, यह विधि बच्चों ने खुद ही तय की।

इसी मुद्दे पर कक्षा 6 के बच्चों के 15 बच्चों के साथ भी काम हुआ।

शिक्षक द्वारा बच्चों से सवाल पूछा गया कि तैरना–डूबना क्या है ? बच्चे कुछ देर तो शान्‍त रहे।  काफी विचार के बाद बच्चों की प्रतिक्रियाएँ या कहें तैरने–डूबने को लेकर बच्चों की परिकल्पनाएँ कुछ इस तरह अभिव्यक्त हुईं –

सोनल : जो चीजें हल्‍की होती हैं वे ऊपर तैरती हैं। जो भारी होती हैं वे डूब जाती हैं।   

सोना : बड़ी चीजें डूब जाती हैं, छोटी चीजें तो तैरती रहतीं हैं।

कविता : नाव और जहाज तो कितने बड़े होते हैं, फिर भी तैरते रहते हैं

इन बातों पर सभी बच्चे पूरी तरह सहमत थे, बिना किसी सन्‍देह के।  मेरे मन में कविता की कही हुई बात बार-बार तैर रही थी। फिर बच्चे 3-3 के समूह बनाकर तैरने वाली व डूबने वाली वस्तुओं की सूची बनाने में जुट गए।  

बातचीत करने पर इन बच्चों ने भी तय किया कि हम इन वस्‍तुओं को पानी में डालकर देखेंगे। बच्चों ने सूची के अनुसार सामग्री इकठ्ठा की। और जुट गए पता करने में। कागज, गत्ता, पत्थर, थर्माकोल, मोमबत्ती, पिन, पत्ती सभी को पानी में डालने पर बच्चों ने वही पाया जो वे सोच रहे थे। अब बची हुई सामग्री के बारे में यह जाँच करने की बारी थी कि यह डूबती है या तैरती है। बच्चों ने पहले टमाटर डाला तो देखा कि वह तैर रहा है। बच्चे निश्चिन्त थे कि अब जब वे आलू को पानी में डालेंगे तो आलू के साथ भी ऐसा ही होने वाला है। बच्चे बहुत खुश भी थे कि उन्हें यह पहले से पता है! पर जब आलू को पानी डाला गया तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। क्‍योंकि वह डूब गया! उनके चेहरे पर कुछ उदासी का भाव भी था। शिक्षक ने सवाल किया कि अगर हम आलू की पतली सी स्लाइस काट लें तो क्या वो तैरेगी? इस पर सभी बच्चे जोर से “हाँ” बोल पड़े। शिक्षक ने कहा, डूब गई तो ? बच्चों का तर्क था कि ऐसा हो ही नहीं सकता, यह तो बहुत ही हल्‍की होगी चिप्स जैसी। शायद बच्चों का यह अनुमान सही था उनकी नजर से, कि कोई इतनी हल्की चीज कैसे डूब सकती है! पर आलू की बिलकुल पतली स्लाइस भी डूब गई। बच्चे चकित थे, यह तो उनकी सोच के परे सा लगा कि यह हो कैसे गया। इसी तरह बच्चों ने सेव और सेव के पतले टुकड़े के साथ भी यह करके देखा। पाया कि दोनों ही तैर रहे हैं यह तो पहले से बिलकुल उल्टा था। बच्चे समझ ही नहीं पा रहे थे कि उनके साथ ये सब क्या हो रहा है!

पर अभी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी थी रमेश ने नीबू उठाकर कहा कि चलो इसे डुबाकर देखते हैं। अब फिर से बच्चों के आँखों में चमक आ गई थी कि यह तो नहीं डूबने वाला। लेकिन नीबू भी डूब चुका था। नीतू के हाथ में कचरी थी और सबका कहना था यह भी डूब जाएगी नीबू और आलू की तरह। जब पानी में डाला तो कचरी ऊपर ही तैर रही थी, और बच्चे अभी भी उसके नीचे जाने का इंतजार कर रहे थे ! पर कचरी कहाँ नीचे जाने वाली थी।

शिक्षक ने उन्हें लहसुन लाकर दिया, आधे बच्चों ने डूबने व आधे बच्चों ने इसके तैरने का दावा किया! जब पानी में डाला तो देखा यह तो तैर रहा है। शिक्षक ने बच्चों से कहा अगर हम इसका छिलका उतार कर लें तो? बच्चों का पक्का विश्वास था कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ! क्योकि छिलके में तो कोई वजन ही नहीं होता। वजन तो लहसुन में ही है! और छिलका हटाएँगे तो लहसुन का वजन कम ही होगा, बढ़ेगा तो नहीं। पर छिले हुए लहसुन को पानी की सतह पर छोड़ा तो वह  गया सीधा तली में ! बच्चे अभी भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे, उन्होंने 2-3 लहसुन और छीले और तुरन्त उन्हें भी पानी में डालकर देखा। सबके सब नीचे जाकर बैठ गए! साबुत नारंगी व छिली हुई नारंगी के साथ भी बिलकुल ऐसा ही हो रहा था! पर अवलोकन के दोहरान से अब बच्चे ये स्वीकार कर चुके थे कि बिना छिलके के लहसुन पानी में डूब जाते है। इसी तरह बच्चों ने चीनी, नमक व आटे को एक–एक कर पानी की सतह पर डाला और पाया कि केवल आटा ही पानी की सतह पर तैरा।  एक–एक करके पानी में डालने पर पाया की मूँगफली, कालीमिर्च तो डूबे ही नहीं जबकि साबूदाने, मेथी डूब गए।  बच्चों ने कहा कि ये तो छोटी–छोटी हैं, फिर भी तैरी नहीं, और बड़ी चीजें (मूँगफली, कालीमिर्च) को तो डूबना चाहिए था पर ये तो तैर रहीं हैं !!

अब बच्चों से शिक्षक द्वारा कुछ बातचीत की गई कि –

  • क्या सभी बड़ी चीजें डूब जाती हैं ? बच्चों का जवाब था, नहीं। बड़ी चीजें : संतरा, टमाटर, बैगन, लकड़ी का बड़ा टुकड़ा। ये सभी तैर रहे थे। छोटी चीजें : कचरी, नीबू, साबूदाना, चीनी, नमक। ये सभी डूब रहे थे
  • क्या सभी हलकी चीजें तैरतीं हैं? सभी बच्चों का जवाब था,नहीं।  हल्की चीजें :  लहसुन, साबूदाना, पिन हल्के थे फिर भी डूब गए। भारी चीजें : सेव, टमाटर, खाली कप - मटका भरी हैं, फिर भी तैरते रहे।

हालाँकि यह सवाल अब भी मौजूद था कि ऐसा क्‍यों हो रहा है, और उसके पीछे क्‍या वैज्ञानिक सिद्धान्‍त हैं। लेकिन इस अवलोकन के बाद मुझे यह समझ आया कि इन सवालों पर बातचीत के शुरुआती समय जैसी मौन सहमति टूट चुकी थी। बातचीत की शुरुआत में बच्चों की तीनों प्रतिक्रियाओं ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया था कि इस तरह तैरने-डूबने के बारे में उन्हें न तो किसी ने कहा होगा, न ही कहीं उन्होंने कहीं ऐसा पढ़ा होगा फिर भी आसपास के अवलोकन से किस तरह से बच्चे अपनी परिकल्पनाएँ गढ़ लेते हैं, चाहे वे सही हों या गलत ! और इसके लिए उनके पास अपने उपयुक्त तर्क भी होते हैं। ऐसी परिस्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि उन्हें सही दिशा किस तरह दी जाए।

इस पूरे कार्य के दौरान मैं सीखने की प्रक्रिया को एक जीवंत अनुभव के रूप में पाती हूँ कि यहाँ बच्चे अपने अनुभवों, मान्यताओं को साझा करते हैं जिसमें काफी हद तक सभी बच्चे भागीदारी कर रहे होते हैं। इसी क्रम में अपने इन विचारों की पड़ताल करके देखते हैं, सावधानीपूर्वक अवलोकनों के व्यवस्थित क्रम की मदद से बच्चे अपने अनुभव कोश में कुछ नया शामिल करने का अवसर लेते हैं, ये नए विचार पुराने अनुभवों को दोहराने, उनमें जोड़-तोड़कर कुछ बदलाव लाने, तुलनाकर कुछ निष्कर्ष बनाने की ओर बढ़ पाते हैं, और धीरे-धीरे यह प्रक्रिया उनकी पुरानी परिकल्पनाओं को फिर से सुगठित कर नया आकार दे पाती है। इस पूरी प्रक्रिया में अवलोकन की भूमिका अहम रही है। इस प्रक्रिया में बच्चे जिस तरह किसी सवाल को लेकर उसके बारे में अनुमान लगाते हैं और ठहर कर अवलोकन करने से उस अनुमान की सत्यता की जाँच भी करते हैं। साथ ही अपने अनुमानों पर स्वयं ही सन्‍देह खड़े कर पाते हैं, और उनके लिए तार्किक आधार भी ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं।

आखिर में महत्वपूर्ण बात यह लगती है इस तरह की प्रक्रियाओं से गुजरने अवसर बच्चों में सवाल पूछने की क्षमता बढ़ती है, इससे उनकी सोच को विस्तृत आयाम मिलते हैं।


अलका तिवारी अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन जिला संस्‍थान, टोंक राजस्‍थान में कार्यरत हैं।

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