कक्षा में बच्‍चों के साथ काम का अनुभव

बच्चे स्वभाव से चंचल ही होते हैं। यह उनका नैसर्गिक गुण है। चंचलता के बिना बचपन भी क्या बचपन रह जाता है। सबको बच्‍चों की चंचलता लुभाती भी है और वे भी सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर ही लेते हैं। परन्तु उनकी यही चंचलता एक शिक्षक के लिए परेशानी का सबब बन जाती है और उसके लिए सिखाने में बाधा भी। क्यूँकि इसी चंचलता के कारण बच्चे कक्षा में ध्यान स्थिर नहीं कर पाते और शिक्षक कई बार उनके ध्यान को स्थिर करने के लिए भय और दण्ड का सहारा लेता है। इस तरह से वह कक्षा में शान्ति का माहौल बनाने में तो कामयाब हो जाता है परन्तु इस तरह से बच्चे अपना ध्यान पढ़ाई में केन्द्रित करने और पढ़े हुए कि समझ बनाने में कितना सफल हो पाते हैं यह शायद ही कोई पूरे विश्वास के साथ कह सकता है। दरअसल ऐसी प्रक्रियाएँ जिनमें किसी कक्षा को व्यवस्थित करने और बच्चों का ध्यान कक्षा-कक्षीय प्रक्रियाओं में लगाने हेतु डर और बल का प्रयोग किया जाता हो, बच्चों से उनका नैसर्गिक गुण अवश्य छीन लेती हैं। सिर्फ शिक्षक ही नहीं अपितु घर में भी हम बच्‍चों के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं। क्यूँकि यही सबसे आसान तरीका हमें लगता है। अगर हम कभी सोचने और तलाशने की कोशिश करें कि हमारे अन्‍दर भी जो डर है वो कैसे पनपे हैं ? मुझे लगता है कहीं न कहीं इन्हीं सब प्रक्रियाओं से गुजरते हुए हम कब डर में बँध गए या यूँ कहें कि बाँध दिए गए। दरअसल इन प्रक्रियाओं का दीर्घकालिक प्रभाव हमें पता ही नहीं चलता और यही सब हम फिर से बच्‍चों के साथ दोहराने लगते हैं। क्या डर के अलावा कोई और माध्यम हो सकता है? जिससे कक्षा में एक अच्छा माहौल बनाया जा सकता हो। हम अगर मानते हैं हो सकता है, तो हमें कुछ रास्ते खोजने पड़ेंगे। हो सकता है कुछ तरीके काम कर जाएँ, कुछ न भी करें यही तो एक शिक्षक के लिए असली चुनौती है।

इस चुनौती का सामना मैंने भी अपनी स्कूल प्रैक्टिस के दौरान किया। कक्षा पाँच के साथ मेरे शुरुआती अनुभव कुछ यूँ थे। कक्षा पाँच के लगभग सभी बच्चे बहुत ही चंचल थे। सभी को मेरा पूरा ध्यान चाहिए होता था। किसी एक बच्चे से बात करती या सुनने की कोशिश करती तो दूसरे बच्चे शोर मचाना शुरू कर देते थे। सब को साथ में उत्तर देना होता था। जब भी समूह बनवाती बच्चों का आपस में झगड़ना स्टार्ट हो जाता था। बहुत समझाने पर भी यह कहकर कि अब नहीं करेंगे परन्तु फिर से वही करने लगते थे। किसी कांसेप्ट को पढ़ना तो दूर की बात कक्षा में दो सेकंड भी शान्ति बना पाना मुश्किल था। मैंने उनके साथ मिलकर उनसे ही कक्षा के लिए कुछ नियम बनाए जैसे कि हम कक्षा में शोर नहीं करेंगे। हम झगड़ा नहीं करेंगे। कोई एक बोलेगा तब सभी शान्‍त रह कर उसे सुनेंगे। प्रश्न पूछने के लिए हाथ उठाएँगे और अपनी बारी आने का इन्तजार करेंगे। परन्तु कुछ भी काम नहीं आया। जो नियम बनाते हैं वह तोड़ते भी हैं।

मुझे कई बार लगा कि शायद ये नहीं चाहते कि मैं इनके साथ काम करूँ। तब मैंने उनसे कहा कि ठीक है आप मेरी कोई बात नहीं सुनते हो तो अब मैं आपकी कक्षा में नहीं आउँगी। किसी का कोई जवाब नहीं आया। मैं थोड़ी देर बाद कक्षा से बाहर आ गई और कक्षा चार में चली गई। उस समय किसी कारणवश अगले दो दिन मेरा स्कूल जाना नहीं हो पाया। तब उन बच्‍चों को बुरा लगा और उन्होंने स्कूल की शिक्षिका से कहा कि आप दीदी को बुला लीजिए हम अब शोर नहीं करेंगे और उनका कहना भी मानेंगे। अगले दिन स्कूल पहुँचने पर वो मुझे अपनी कक्षा में इस वादे के साथ लेकर गए कि अब वो शोर नहीं करेंगे।

दो से तीन दिन सब ठीक चला। हमें जैसा माहौल चाहिए था वो मिला भी, परन्तु ये भी कुछ ही दिन चला। मैं थक चुकी थी मेरा आधा समय सिर्फ कक्षा में शान्ति बनाने की कोशिश में जाता था। फिर हमने एक नियम और खोजा जिसके अन्तर्गत हमने एक नया नियम बनाया। जिसमें बोर्ड पर हम Q बना देते थे जब हमें कक्षा में थोड़ी शान्ति चाहिए होती थी। इसमें बच्चे आपस में बात कर सकते थे परन्तु धीरे और Q को जब हम सर्किल करेंगे इसका मतलब उस समय कक्षा में पिन-ड्राप साइलेंस की जरूरत रहेगी। इस नियम का भी हाल पहले नियम की तरह हुआ। जबकि यही नियम कक्षा चार में बहुत अच्छे से काम किया। मेरे काफी प्रयासों के बाद भी इस चुनौती का हल नहीं मिल रहा था।

समझ में नहीं आ रहा था इनकी ऊर्जा को किस तरह से मैनेज करूँ।। मैंने कक्षा में एक बात को हमेशा अनुभव किया वह यह थी कि जब भी कक्षा में चैप्टर को लेकर कुछ और बात की जाए तो वे बड़ी गम्भीरता से सुनते थे और ख़ासतौर से तब, जब उन मुद्दों पर हो जिनको वे जानना चाहते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए इस बार मैंने अपने अगले पाठ की योजना कुछ इस तरह बनाई जिसमें मैंने बच्चों के लिए नही बल्कि बच्चों को मेरे लिए पाठ योजना बनाने की जिम्मेदारी दी। मैंने उनको पाठ को पढ़कर उसमें से जो वो जानना चाहते थे पूछने को कहा और सभी बच्चों के द्वारा निकाले गए गए प्रश्नों को हमने बोर्ड पर लिख दिया। उनके इन प्रश्नों ने मेरे काम को थोड़ा आसान कर दिया एक तो मेरे लिए पाठ योजना तैयार हो चुकी थी, दूसरा चूँकि इन सवालों के जवाब वे जानना चाहते थे न कि मैं उन्हें पढ़ाना चाहती थी इसलिए कक्षा में शान्ति और पढ़ाई का माहौल बनाने में मुझे मदद मिली।

यह एक बेहतर तरीका था इससे कक्षा में पढ़ने के लिए शान्ति का माहौल बनाने के लिए। जिसका आईडिया मुझे हमारी संस्था में CEO के साथ की गई मीटिंग से आया था। इस मीटिंग में उन्होंने सभी से प्रश्न पूछने को कहा और बोर्ड पर उन सवालों को लिखकर बारी-बारी से सबका उत्तर दिया। यही मैंने अपनी कक्षा में उपयोग किया और परिणाम बेहतर थे। इस दौरान मुझे यह भी महसूस हुआ कि हम अगर बच्चे क्या जानना चाहते हैं, को और हम क्या बताना चाहते को,साथ लेकर चलें तो शिक्षा के उदेश्य आसानी से हासिल किए जा सकते हैं। हमारी भी तो रूचि जो हम जानना चाहते हैं में ज्यादा होती है अपेक्षाकृत जो कोई हमें बताना चाहता है। मैं यह तो नहीं कह सकती कि यह तरीका हमेशा और हर विषय के लिए कारगार हो सकता है, परन्तु यह एक तरीका हो सकता है जिसे आप बच्‍चों, कक्षा और विषय के किसाब से अपनी कक्षा में प्रयोग कर सकते हैं। वैसे भी तो स्कूल एक शिक्षक के लिए प्रयोगशाला ही है, जो वो नए तरीके खोज कर उन पर काम करके देख सकता है। क्या हुआ कुछ तरीके काम नहीं करेंगे, परन्तु यही आपको एक बेहतर तरीके की खोज में मदद करेंगे। बस एक विश्वास रखना होगा की बिना दण्ड और भय के भी कक्षा में पढ़ने-पढ़ाने का माहौल बनाया जा सकता है। और यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्यूँकि बच्चे प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूप से सीखते हैं।


स्‍वाति भण्‍डारी, स्रोत व्‍यक्ति, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, राजसमंद, राजस्‍थान   चित्र : प्रशान्‍त सोनी

 

टिप्पणियाँ

kku का छायाचित्र

अति उत्तम लेख । निश्चित रूप से कक्षा के अध्यापक उपरोक्त अनुभव को अपनी कक्षा में प्रयोग कर सकते हैं ।

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