एक विज्ञान मेले की तैयारी के अनुभव : एक

बाड़मेर में विज्ञान मेले का आयोजन किया जाना था।  इसकी तैयारी ग्‍यारह दिन पहले शुरू की गई। इस दौरान जो अनुभव हुए उन्‍हें मैंने दिनवार दर्ज करने की कोशिश की है।

पहला दिन योजना निर्माण पर केन्द्रित रहा। इस योजना निर्माण के अन्‍तर्गत विद्यालयों की सामान्य जानकारी, भौगोलिक जानकारी, अब तक किए गए कार्य का स्तर, विषय अध्यापकों से अपेक्षित सहयोग, विभिन्न थीम का चयन एवं इससे संबन्धित सामग्री, समय नियोजन, दैनिक दिनचर्या, रहने का स्थान निर्धारित करना, मार्ग निर्धारित करना, बच्चों का चयन, कार्य करने की रूपरेखा इत्यादि प्रमुख रहे। विज्ञान समूह की ओर से सहयोग करने वाले सभी व्यक्तियों द्वारा पूर्व में ही कुछ थीम तय की गई थी जिन पर कार्य किया जाना था। ये सभी थीम कक्षा आठ तक की विज्ञान पाठ्य पुस्तकों से ली गई थीं जिनका मुख्य आधार दैनिक जीवन में विज्ञान और विज्ञान के अनुप्रयोग थे। मेले का आयोजन दो ब्लॉक के विद्यालयों में किया जाना था जिसमें एक बायतु ब्लॉक था जिसके दो विद्यालयों एवं चोहटन ब्लॉक के दो विद्यालयों का चयन किया गया था। अतः चार विद्यालयों हेतु कुल सोलह थीम का चयन किया गया। बायतु ब्लॉक हेतु अन्य साथियों ने विज्ञान के अनुप्रयोग से संबन्धित थीम का चयन किया। मैंने दैनिक जीवन में विज्ञान के उपयोग थीम का चयन किया। यह थीम इसलिए भी महत्वपूर्ण लगी क्योंकि इसमें बच्चों एवं इनके परिवेश में मिलने वाली चीजें एवं होने वाली घटनाएँ मुख्य रूप से निहित थीं। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने दो विद्यालयों हेतु कुल आठ थीम का चयन किया गया जो निम्न प्रकार हैं :

  1. क्षेत्र में पाए जाने वाले साँपों की सामान्य जानकारी, काटने के लक्षण, सावधानियाँ एवं प्राथमिक उपचार।
  2. क्षेत्रीय फसलें एवं सिंचाई के प्रकार/साधन।
  3. दाब एवं इसके अनुप्रयोग।
  4. ऊष्मा एवं तापमान।
  5. क्षेत्रीय बीमारियाँ, उनके लक्षण, घरेलू उपचार एवं आवश्यक उपचार।
  6. ध्वनि एवं चालकता।
  7. अग्नि से सुरक्षा।  
  8. अम्ल-क्षार।

प्रथम चार थीम का चयन राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, अंबावा एवं अन्तिम चार का चयन राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, रंगवाली के लिए किया गया। रंगवाली मेले के आयोजन स्थल के रूप में तय किया गया था। इसी कारण बाड़मेर में कार्यरत विज्ञान विषय के साथी महेश इस विद्यालय में जाकर कुछ काम प्रारम्भ कर चुके थे।

उपरोक्त विषयों पर चर्चा एवं संबन्धित योजना निर्माण के साथ ही मैं शाम को चोहटन ब्लॉक के लिए रवाना हुआ जहाँ विरात्रा माता मन्दिर परिसर में रहने की व्यवस्था की गई थी। यहाँ से अगले दिन से मुझे विद्यालयों में जाना प्रारम्भ करना था जो कि यहाँ से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर थे।

दूसरा दिन

मुझे पहले ही बताया गया था कि विद्यालयों में बच्चों का स्तर थोड़ा कमजोर है व अधिकतर बच्चे अन्‍तर्मुखी स्वभाव के हैं। अर्थात किसी के सामने कुछ बोलने, जवाब देने, अपने विचार व्यक्त करने, घुलने-मिलने इत्यादि में थोड़े कमजोर हैं, मैंने पहले ही इन कारकों से पार पाने के बारे मे सोचना शुरू कर दिया था। इसी आधार पर मैंने इन विद्यालयों में अपने कार्य करने की योजना बनाई व साथ ही इस विषय पर सोचना शुरू किया कि कैसे मैं इन सबके साथ मित्रवत व्यवहार स्थापित कर सकता हूँ। पहले विद्यालय अंबावा में पहुँचने एवं शिक्षकों के साथ परिचय के बाद मॉडल प्रस्तुतीकरण हेतु बच्चों के चयन का कार्य किया गया। यहाँ कक्षा 6, 7 व 8 एक साथ बैठी थीं अतः यह कार्य एक ही बार में पूर्ण हुआ। सभी विद्यार्थियों के समक्ष प्रश्न रखा गया कि कौन-कौन भाग लेना चाहते हैं व किस विषय में भाग लेना चाहते हैं। बस इसी एक प्रश्न ने मुझे चौदह विद्यार्थियों का समूह दे दिया। मेरे लिए यह एक अच्छी शुरुआत थी और यह जानकार और भी खुशी हुई कि विद्यार्थी विज्ञान विषय की जटिलता जानते हुए भी इसमें भाग लेने के लिए तैयार थे।

इस पूरे समूह को लेकर मैं विद्यालय के खेल मैदान में एक पेड़ के नीचे बैठा क्योंकि इसके अलावा कोई अन्य स्थान उपलब्ध नहीं था, लेकिन मुझे यह एक बन्‍द कमरे में बैठने से बेहतर लगा। यहाँ सामान्य परिचय के बाद मैंने गाँव देखने की इच्छा जाहिर की। गाँव दिखाने की बात सामने आते ही सभी के चेहरे जैसे खिल गए। किसी आगंतुक के साथ गाँव की यात्रा करना शायद उनके लिए पहला अवसर था।  सभी मुझे लेकर गाँव कि ओर निकल पड़े व गाँव की एक-एक चीज दिखाई। इस यात्रा का मेरा एक पूर्व निर्धारित उद्देश्य था कि मैं सभी को अपने साथ सहज कर सकूँ और इसमें मैं सफल भी हुआ। इसके अलावा घूमते हुए मैंने विद्यार्थियों से गाँव से संबन्धित कई विषयों पर बातचीत कि जिसमें सभी ने खुलकर अपने विचार रखे व जानकारी दी। यह बात अलग है कि उन्हें यह पता नहीं था कि हम बातचीत के इन्हीं विषयों पर कार्य करने वाले हैं। यहाँ उनसे की गई बातचीत ने संबन्धित विषय पर उनके सम्पूर्ण पूर्व ज्ञान को मेरे सामने रख दिया, जो मेरे आगे कार्य योजना बनाने के लिए आवश्यक था। कुल मिलाकर यह विद्यार्थियों के लिए एक भ्रमण था लेकिन इसने मेरे लिए कई समस्याएँ हल कर दी थीं व आगे का मार्ग भी तय कर दिया था। अनुभव यह रहा कि मेरे इस विद्यालय में व्यतीत किए गए पूरे समय में    मुझे कभी भी यह अहसास नहीं हुआ कि बच्चे मुझसे कुछ कह नहीं पा रहे या मेरे और उनके बीच कोई वैचारिक दूरी है।

रंगवाली विद्यालय में प्रारम्भिक परिचय के बाद महेश द्वारा चयनित विद्यार्थियों के समूह के बारे मे बातचीत की। यह जानकार धक्का सा लगा कि जिन विद्यार्थीयों का चयन महेश ने किया था, उन्हें दूसरे विषय समूह के साथियों ने अपने समूह में ले लिया था। वैसे देखा जाए तो इन विद्यार्थियों को दूसरे समूह में शामिल नहीं किया जाना चाहिए था, किन्तु कक्षा में ये ही विद्यार्थी थे जो कुछ बोल पा रहे थे या जिनका स्तर कुछ अच्छा था, अतः विषय समूह के साथियों ने उन्हें अपने समूह में जोड़ लिया था। अब मेरे सामने नया सवाल खड़ा हो गया था और वह था बाकी बचे विद्यार्थियों मे से विज्ञान विषय हेतु चयन करना। इस कार्य में विद्यालय के शिक्षक ने मेरी सहायता की। विद्यार्थियों के पुनः चयन के बाद मैंने उनके साथ बातचीत शुरू की व यह जानने का प्रयास किया कि अब तक उनसे किन विषयों पर कितनी बात की जा चुकी है। परिणाम नकारात्मक निकले जब कोई भी यह बताने में विफल रहा। थोड़ा और प्रयास करने पर भी जब कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ तो मैंने खेल गतिविधि कराने का निर्णय लिया व विद्यार्थियों के साथ गतिविधि में  व्यस्त हो गया। रंगवाली ने यह बात साफ कर दी थी कि जितना आसान मैं इस काम को सोच रहा था वह इतना आसान नहीं है।

तीसरा दिन

अंबावा में अगले दिन का प्रारम्भ विद्यार्थियों द्वारा गत दिवस दी गई जानकारी पर बातचीत से प्रारम्भ हुआ जहाँ मैंने उनकी जानकारी के साथ कुछ जानकारी मेरी ओर से जोड़ दी। आज का ज्‍यादातर समय उनके अनुभवों को सुनने व समझने में गया व साथ ही कुछ आगे जोड़ने का कार्य किया। उदाहरण के लिए यह जानने का प्रयास किया कि साँपों की कौन-कौन सी प्रजाति वहाँ पाई जाती हैं व उनके काटने पर क्या उपचार किया जाता है। इसके आगे कुछ सम्‍भावित उपचार मेरी ओर से जोड़ दिए गए। उनके द्वारा बताए गए उपचारों में झाड़ा लगाना (झाड-फूँक) व रोगी को घी पिलाना मुख्य था। यह जानकार आश्चर्य हुआ कि वहाँ साँप के काटने की घटना सामान्य थी लेकिन उनके द्वारा किए गए उपचारों के बाद कभी कोई बड़ी हानि नहीं हुई। इसी प्रकार अन्य विषयों पर भी बात हुई और विद्यार्थियों की ओर से उपरोक्त प्रथम चार थीम पर कार्य करने की इच्छा जाहिर की गई अतः उनकी रुचि के आधार पर यह चार थीम अंबावा विद्यालय के लिए नियत कर दी गई।

रंगवाली में आज का दिन थोड़ा रोचक था। कल की खेल गतिविधि ने शायद थोड़ा काम कर दिया था। सभी विद्यार्थी मुझे देखकर थोड़ा खुश लगे। आज फिर मैंने उन्हीं बिन्दुओं पर चर्चा प्रारम्भ की। जानकारी तो ज्यादा नहीं मिली लेकिन जानकारी देने का कुछ प्रयास किया गया लेकिन वह भी मेरे लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ और अधिक जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से मेरे द्वारा कुछ पूरक प्रश्नों का प्रयोग किया गया जो कि उनके सामान्य अवलोकन व अनुभव से जुड़े थे। इससे विद्यार्थी थोड़ा सहज हुए व जवाब देने की प्रक्रिया शुरू हुई। यहाँ जो विचित्र बात सामने आई वह थी वहाँ सामान्य तौर पर होने वाली बीमारियों के बारे में। पहले तो सभी ने पुस्तक में दी गई बीमारियों के नाम व लक्षण बता दिए, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या ये सभी बीमारियाँ यहाँ होती हैं तो जवाब नहीं में आया। आगे बढ़ते हुए मैंने उनसे विभिन्न बीमारियों के उनके द्वारा किए जाने वाले उपचार पूछे। इन प्रश्नों के उत्तर कुछ इस प्रकार थे:

मैं : बुखार आ जाने पर क्या दवा लेते हो?

विद्यार्थी : अमल।

मैं : खाँसी-जुकाम होने पर?

विद्यार्थी : सर, अमल।

मैं : सर दर्द-पेट दर्द में?

विद्यार्थी : अमल।

मैं यह जानकार हैरान था कि यहाँ लगभग सभी बीमारियों के लिए अमल का प्रयोग किया जाता है। अमल यहाँ सामान्य रूप से उगाई जाने वाली फसल है जिसे हम सभी अफीम (Opium) के नाम से जानते हैं। यह एक नशीला पदार्थ है जिसका उत्पादन व प्रयोग करना गैर कानूनी है। यहाँ यह कुछ मात्रा में घरेलू उपयोग हेतु उगाया जाता है। खैर, विभिन्न बीमारियों की अमल के अतिरिक्त जानकारी एकत्रित करने हेतु मैंने उन्हें अपने अभिभावकों से चर्चा करने व लक्षण एवं उपचार अपनी कॉपी में नोट करके लाने का गृहकार्य दिया।

चौथा दिन

अंबावा में आज के दिन समूह निर्माण का कार्य मुख्य रहा। इससे पहले रुचि के आधार पर प्रमुख थीम का चयन कर लिया गया था, अतः अब बारी थी सभी विद्यार्थियों को छोटे समूहों मे बाँटने की। इसे भी मैंने उनकी रुचि के आधार पर ही पूर्ण किया व जिसने अपनी इच्छा से थीम को चुना, उसे उसी थीम समूह के लिए पाबन्‍द किया। इसके अलावा बाकी समय में पूर्व में की गई चर्चा का दोहरान किया गया व इस चर्चा के दौरान मेरे द्वारा कुछ और जानकारी इसमे जोड़ी गई। अब यह निर्धारित किया गया कि अगले दिन से छोटे समूह में ही बात की जाएगी व जिसे जो थीम दी गई है, उनसे उसी पर बात की जाएगी। इसके साथ ही सभी को अब तक की गई बातचीत व उनकी समझ को लिखकर लाने का कार्य दिया गया।

रंगवाली में लगभग सभी थीम पर समूह में बात की गई लेकिन गाड़ी अभी भी अमल पर ही अटकी हुई थी। यहाँ तक कि कॉपी में लिखे इलाज में भी अमल का ही जिक्र था। अतः फिर से इस विषय पर सारी बातचीत शून्य से शुरू की गई।

पाँचवाँ दिन  

अंबावा में आज जाते ही दोहरान कार्य शुरू किया व जो कुछ सभी लिखकर लाए थे, उससे जोड़ते हुए बातचीत को आगे बढ़ाया। आज मेरे द्वारा समूह में तापमापी का प्रदर्शन किया गया व इससे संबन्धित बात की गई। ऊष्मा व ताप पर और अधिक जानकारी के लिए उनकी पाठ्यपुस्तक में दिए गए पाठ का अध्ययन करने को कहा।

रंगवाली मे स्थितियाँ गम्‍भीर थीं। मेरे प्रयासों के बाद भी विद्यार्थीयों का स्तर नहीं बढ़ पा रहा था। विभिन्न रोगों एवं इलाज में भी विद्यार्थी अभी तक अमल पर ही अटके थे। विद्यार्थियों के अमल के प्रति इस प्रगाढ़ प्रेम को देखते हुए अन्‍त में मैंने इस थीम को नमस्कार कह कोई ओर थीम लाने का निर्णय किया। अब विभिन्न रोगों की जगह मैंने पादप अकारिकी (पौधों की संरचना) को चुना। जैसा कि विद्यार्थी अपने आसपास के परिवेश से अच्छी तरह परिचित थे, मुझे इस थीम पर कार्य करना कुछ आसान लगा। प्रारम्भिक बातचीत हेतु मैं कुछ विद्यार्थियों को लेकर विद्यालय एवं आसपास के पेड़-पौधों का अवलोकन करने ले गया। यहाँ पौधों के विभिन्न अंगों उनके कार्यों, संरचना, पैटर्न इत्यादि पर बात की। विद्यार्थी इन पौधों से परिचित थे अतः इनके बारे मे बता पा रहे थे।

छटवाँ दिन

अंबावा में किए कार्य एवं दैनिक दोहरान का कुछ परिणाम समूह द्वारा किए जा रहे प्रश्नों के उत्तर में दिखने लगा था। अतः मैंने सभी समूहों के लिए जानकारी का स्तर और बढ़ाया व इनसे संबन्धित आयामों एवं कारकों को विषय से जोड़ा। आज दाब से संबन्धित समूह एवं अन्य सभी के समक्ष इससे संबन्धित प्रयोग का प्रस्तुतीकरण किया व इसके बारे मे बातचीत की। बातचीत का मुख्य आधार उनसे इसका दैनिक जीवन में उपयोग अथवा अनुभव जानने का प्रयास था, लेकिन पानी की टंकी से आगे वे भी नहीं बढ़ सके।

रंगवाली में आज दोहरान के बाद समूह निर्माण का कार्य किया। यहाँ समूह निर्माण में एक दुविधा यह आई की जो विद्यार्थी कुछ बोलने, प्रस्तुत करने मे सहज नजर आ रहे थे, रुचि पूछने पर सभी ने अम्ल-क्षार के लिए अपनी इच्छा जताई। यहाँ मन में यह द्वंन्‍द चल रहा था की यदि बाकी विद्यार्थी अपेक्षित जानकारी न याद रख पाए या प्रस्तुतीकरण के लिए पूर्ण रूप से तैयार न हो पाए तो क्या होगा। शिक्षक ने मेरे इस द्वंन्‍द को यह कहकर और प्रबल कर दिया कि ये बच्चे कुछ नहीं बोल सकते। यह एक नकारात्मक विचार था जो कि विद्यार्थियों को हतोत्साहित करता है और वह उनके चेहरे पर दिखा भी। बात को सम्‍भालते हुए मैंने शिक्षक को चुनौती दी कि ये ही बच्चे आपको प्रस्तुत करके दिखाएँगे। शिक्षक भी मेरी योजना को भाँप गए व उन्होंने मेरी इस चुनौती को स्वीकार किया। अन्‍त में इन सभी विद्यार्थियों को एक-एक समूह का नेतृत्व करने का निश्चय किया गया ताकि अगर बाकी कुछ भूल भी जाएँ ये स्थिति सम्‍भाल लें। तैयारी को आगे बढ़ाते हुए मैंने शिक्षक से सम्पूर्ण जानकारी समूहवार दर्ज करने का अनुरोध किया व पादप समूह को अवलोकन के लिए लेकर चला गया। वापस आकर लिखवाई गई जानकारी को याद करके आने का कार्य दिया।

सातवाँ दिन

आज रविवार का दिन था और कायदे से यह मेरे आराम करने का दिन था, लेकिन...??? पूरा दिन आगे की तैयारियों की भेंट चढ़ गया। आज के पूरे दिन बैठकर अलग-अलग थीम से संबन्धित पोस्टर, मॉडल, प्रिंट इत्यादि तैयार करने का काम किया। इसके लिए कुछ खरीदारी भी करनी पड़ी। बाकी तो सब सामान आसानी से मिल गया लेकिन एक एलईडी बल्ब ने पूरे बाड़मेर के बाजार के दर्शन करा दिए। पर लगातार, अथक प्रयास ने आखिरकार सफलता दिला ही दी। इस एक दिन की छुट्टी ने (स्कूल से, काम से नहीं) काफी काम आसान कर दिया।

आठवाँ दिन

अंबावा में आज का दिन प्रार्थना सभा से शुरू हुआ जहाँ एक समूह ने सभी के सामने अपनी थीम का प्रस्तुतीकरण किया व शिक्षक द्वारा किए गए सवालों का जवाब दिया। यह एक बेहतर आत्मविश्वास का नमूना था। इसके बाद सभी समूहों के साथ जानकारी को और आगे बढ़ाते हुए बातचीत की गई जिसमें मुख्य रूप से चयनित थीम के दैनिक जीवन से संबन्धित उदाहरणों पर बात की गई। इसके बाद सभी समूहों से प्रस्तुतीकरण कराया गया। यहाँ एक बात जो ध्यान में आई वह थी कि जैसे मैंने उन्हें बताया था उन्होंने वैसे का वैसे ही बोल दिया। यानि एक बार शुरू हुए तो जितनी जानकारी दी गई थी, पूरी की पूरी बिना रुके बोल दी गई। इससे यह बात निकल कर आई की सवाल किए जाने पर कितना व किस प्रकार बताना है और साथ ही कोई सवाल न आने की स्थिति में किस प्रकार बातचीत शुरू करनी है, यह समझना चाहिए।

रंगवाली में काम समूहों के साथ दोहरान के साथ शुरू हुआ जहाँ थोड़ी-थोड़ी जानकारी जोड़ी जा रही थी। इसी क्रम में कक्षा में हल्दी पत्र तैयार कराया गया व इसकी सहायता से विभिन्न जाँच भी की गई। परिणाम अपेक्षाकृत प्राप्त नहीं हुए किन्तु यह कार्य घर पर दोबारा करने का निर्णय लिया गया। एक अन्य समूह (अग्नि सुरक्षा) के साथ अग्नि शमन यंत्र की संरचना एवं कार्यविधि पर चर्चा हुई व विद्यालय में रखे अग्नि शमन यंत्र का प्रदर्शन कर इसकी कार्यविधि बताई। अन्य समूह के लिए गृहकार्य दिया गया जिसमे उनके आस-पास उगने वाले विभिन्न पादपों के नमूने लाने व इनसे संबन्धित जानकारी जुटाने को कहा गया।

नौवाँ दिन

अंबावा मे आज प्रार्थना सभा में दूसरे समूह द्वारा प्रस्तुतीकरण किया गया। यह गत दिवस किए गए प्रस्तुतीकरण से बेहतर था। आज का काम आगे बढ़ाते हुए बच्चों के साथ मिलकर पोस्टर निर्माण का कार्य किया गया व इनकी सहायता से प्रस्तुतीकरण कराया गया। कृषि से संबन्धित समूह वाले विद्यार्थी कुछ नमूने अपने साथ लेकर आए थे। अतः इन्हें प्रस्तुतीकरण करने के दौरान स्टॉल पर रखने का निर्णय किया गया। इसी समूह की सहायता से विभिन्न फसलों को उनके मौसम, उत्पाद एवं उपयोग के आधार पर सारणीबद्ध किया गया।

रंगवाली में शिक्षक द्वारा विभिन्न समूहों के साथ कार्य किया जा रहा था अतः मैंने यह समय मॉडल बनाने में उपयोग किया। अम्ल-क्षार की जाँच व विभिन्न खाद्य वस्तुओं में पाए जाने वाले अम्ल-क्षारों के मिलान हेतु एक विद्युत परिपथ का निर्माण किया जो सही जोड़े को मिलाने पर बल्ब जलाकर उत्तर के सही होने की पुष्टि करता है। इसके अलावा समूह को दिए गए गृहकार्य पर चर्चा की व आज उन्हें लाल व नीले लिटमस पत्र देकर व घरेलू वस्तुओं की इनके आधार पर जाँच करने का कार्य दिया गया।

दसवाँ दिन

अंबावा विद्यालय के समूह अब तक एक अच्छे स्तर पर आ चुके थे। अतः आज का दिन मॉडल निर्माण व प्रस्तुतीकरण में ही व्यतीत किया गया। इस डेमो में सहायक सामग्री का प्रयोग किया गया जिसका समूह ने भरपूर उपयोग किया।

रंगवाली में आज तीन समूहों ने अपना प्रस्तुतीकरण दिया व इनके साथ शिक्षक एवं अन्य समूहों की सहायता से प्रश्नोत्तर किया गया जिससे प्रस्तुतकर्ता समूह का कुछ अभ्यास हो सके व साथ ही कुछ आत्मविश्वास भी बढ़ सके।

ग्‍यारहवाँ दिन

आज विद्यालय में कार्य करने का अन्तिम दिन था अतः मैंने ज्यादा चर्चा नहीं की। सभी समूहों ने ही एक-दूसरे के समक्ष अपना प्रस्तुतीकरण दिया। आज मॉडल से संबन्धित बचे हुए कार्य को पूर्ण किया गया व ये सभी मॉडल रंगवाली में ले जाकर रखने हेतु अंबावा से एकत्रित कर लिए गए। आज बच्चों की ओर से एक ही सवाल आया: सर, फिर कब आओगे...?? यह एक ऐसा सवाल था जो हमारे जुड़ाव को दर्शाता है। मेरे अब इस विद्यालय में दोबारा न आने की सम्‍भावना ने माहौल को कुछ नम कर दिया।

अंबावा में आज फिर तीन समूहों ने प्रस्तुतीकरण किया। आज के दिन की खास बात यह थी कि समूह शिक्षक द्वारा घुमा-घुमाकर पूछे जा रहे प्रश्नों का भी उत्तर दे पा रहे थे। मेरे लिए शायद यही सफलता की परिभाषा थी। अब तक सभी मॉडल तैयार थे जिन्हें विद्यालय मे ही रखवा दिया गया व अगले दिन किए जाने वाले बाल मेले से संबन्धित अन्य तैयारियों में जुट गया।

बारहवाँ दिन  

बाड़मेर यात्रा का आज मेरा अन्तिम दिन था और यही आयोजन का दिन भी था। अतः ये बात तो बिलकुल साफ थी कि आज बहुत दौड़-भाग होने वाली थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में किए गए कार्यो एवं प्राप्त परिणामों ने मुझमें इस भाग-दौड़ के लिए आवश्यक ऊर्जा भरने का काम किया। आज सीधे मेला स्थल रंगवाली स्कूल गया जहाँ जाते ही दो कमरों में विभिन्न थीम /समूहों के लिए स्थान निर्धारित करने व तैयार की गई सहायक सामग्री को निश्चित स्थान पर रखने का कार्य शुरू कर दिया। दो कमरों में आठ समूहों को रखने के दौरान यह विचार मन में आया कि  समूह इस प्रकार रखे जाएँ जिससे प्रस्तुत करने वाले दोनों विद्यालयों के विद्यार्थी एक-दूसरे से मिल पाएँ व बातचीत कर पाएँ। इसीलिए एक मिश्रित समूह का निर्माण किया। मैंने लगभग सभी विषय स्टॉल का अवलोकन किया व दो-दो करके प्रस्तुतकर्ता समूहों को भी अवलोकन हेतु भेजा।

यह देख कर अच्छा लगा कि सभी अच्छे से प्रस्तुत कर पा रहे थे व प्रश्नों के उत्तर दे पा रहे थे। कुछ बच्चों ने विभिन्न थीम को समझने के अपने ही तरीके निकाल लिए थे, जो कि आगंतुकों में कौतूहल बनाने एवं जिज्ञासा बढ़ाने मे मददगार रहे। (जारी)


आशीष शर्मा, अज़ीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्‍थान

टिप्पणियाँ

Zafar का छायाचित्र

ऐसे अच्छे डॉक्यूमेंट के लिए धन्यवाद| कदम दर कदम जो दस्तावेजीकरण किया है उसे पढ़ के पूरी यात्रा का पता चला| साथ ही ऐसे प्रयास बाकी लोगों को भी मदद करेंगे और हाँ ऐसे ही लिखते रहिए| मज़ा आया

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