एक पुस्तकालय कार्यकर्त्‍ता के नोट्स

स्कूल का पुस्तकालय किताबों का स्टोर मात्र नहीं है। न ही वे काँच वाली आलमारी में सिर्फ सजाया जाने वाला सामान। स्कूल का पुस्तकालय बच्चों और शिक्षकों का एक ऐसा साझा मंच होना चाहिए जहाँ वे साथ मिल बैठकर किताबों को पढ़ने, चर्चा करने, नई किताबें बनाने, फट चुकी किताबों को ठीक करने का काम साझा रूप से करते हों। पुस्तकालय को स्कूल के किसी कमरे के कोने में खोलने का आशय उसे स्कूल की गतिविधियों से किनारे करना नहीं है।

लेकिन जब भी स्कूल में पुस्तकालय को चलाने की बात होती है तो मन में किसी खास किस्म के पुस्तकालय का बिम्ब उभरता है। ऐसा पुस्तकालय जहाँ किसी कमरे में बहुत सारी किताबें करीने से सजी हुई होंगी। हर किताब के खाने में उससे सम्‍बन्‍धित जानकारी व पुस्तकालय संचालित करने वाले व्यक्ति यानी पुस्तकालयाध्यक्ष की छवि हावी होने लगती है। इन किताबों का जुड़ाव किसी व्यक्ति या बच्चों से हो पाए इसके लिए परम्परागत तरीके ही सूझते हैं जो प्रभावी तो हैं लेकिन पुस्तकालय को समग्रता से महसूस करने या कराने में नाकाफी होते हैं।

भारत ज्ञानविज्ञान समिति के जनवाचन आन्‍दोलन में इस तरीके की छवि को तोड़ने वाले प्रयास के साथ जुड़ने के बाद लगा कि पुस्तकालय की छवि कुछ अलग भी हो सकती है। जहाँ किताबें जरिया होती हैं सिर्फ और सिर्फ एक माध्यम, लक्ष्य कुछ और होता है। लक्ष्य होता है किताबों के इर्दगिर्द होने वाली चर्चा, विमर्श, समुदाय की दिक्कतों, समाज में चल रहे रूढ़िवादी ताने-बाने को बदलने की योजना।

और जब यह सब हो रहा होता है तो तब लगता है पुस्तकालय सच में माध्यम ही तो है। यह एक माध्यम मात्र है लोगों से संवाद करने का। उनके परिवेश में चल रही परिघटनाओं, उनके जीवन के संघर्षों से बदलाव की शुरुआत के गीत लिखने का। तब पुस्तकालय जनवाचन आन्‍दोलन से जुड़े साथियों के झोले में होता था। जिनमें बीस-पच्चीस किताबें और ढेर सारे सपने होते थे। ये सपने गाँव की मिट्टी की सौंधी खुशबु से लबरेज होने के साथ समाज परिवर्तन का माद्दा लिए होते थे।

सतत् शिक्षा केन्द्रों पर गाँव के युवक-युवतियों, किसान, मजदूर और बच्चों के साथ किताब को हाव-भाव के साथ ऊँची आवाज में पढ़ने और उस पर चर्चा करते हुए केन्द्र की शुरुआत होती थी। पहले दिन ली गई किताबों को ले गए साथियों द्वारा उनके बारे में बताना और किताबों के साथ-साथ गाँव की खेती किसानी से लेकर वो तमाम बातें साझी होती थीं जो वहाँ जुड़े किसी एक के जीवन से जुड़ा हो।

सतत् शिक्षा केन्द्र में गतिविधियाँ किताब केन्द्रित न होकर किताबों के जरिये होती थीं। किताब को बारी-बारी से पढ़कर दूसरों को सुनाना, अखबारों को पढ़ना, अखबारों से जरूरी लेखों का संकलन कर फाईल तैयार करना, फटी किताबों को गोंद से चिपकाना, पुस्तकालय के लिए स्थानीय स्तर पर किताबों की व्यवस्था के लिए चर्चा करना। जिन लोगों से पुरानी किताब मिलने की आस हो उनसे जाकर बातचीत करना। ये सब उस दौर में सतत् रूप से चलता था। केन्द्र के बाहर भी चलते-फिरते कोई पढ़ने वाला साथी मिल जाए तो पुस्तकालय शुरू हो जाता था। इन सबके साथ-साथ किताबों को खरीदकर घर पर पढ़ना और अन्य लोगों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करना ये सब चलता था।

जनवाचन आन्दोलन के बाद के दौर में जब स्कूलों के साथ जुड़कर किताबों के इर्दगिर्द काम करने का मौका मिला तो फिर से यही सवाल मन में कौंधने लगा कि स्कूल में पुस्तकालय कैसा होना चाहिए। खुद ही जवाब देने की कोशिश की कि किताब जरिया है। बस! फिर से काम शुरू करने की हिम्मत की।

स्कूल का पुस्तकालय

एक सक्रिय पुस्तकालय को शुरू करने से पहले शिक्षिकाओं और बच्चों के साथ इस पर विस्तार से बातचीत की गई। किताबों को स्कूल में पढ़ने, घर ले जाने व पढ़ी गई किताबों पर क्या-क्या कर सकते हैं पर चर्चा के बाद स्कूल का पुस्तकालय शुरू किया गया। कक्षा के ही एक कोने में पुस्तकें लगाकर इसको तैयार किया।

बच्चों की पुस्तकालय में पाठक-प्रबन्धक-सन्दर्भदाता के रूप में भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई। बच्चों के साथ बहुत सारे सपने बुने गए, बच्चे भी उत्साह के साथ इनको पूरा करने के लिए सुझाव, योजना व जिम्मेदारी में हिस्सेदारी जैसी चर्चाएँ कर रहे थे। पाठ्यपुस्तक से इतर अन्य किताबों का उपयोग छुट-पुट रूप से स्कूल में होता था लेकिन पुस्तकालय के माध्यम से ये सब बातें बच्चों व शिक्षकों के लिए नई थीं।

किताबें पढ़ने की शुरुआत

किताब को पढ़ने पर बहुत सारे प्रयोग किए गए। शुरुआत दूर-दूर बैठकर किताब को जोर-जोर से पढ़ना व पढ़ी गई किताब पर गोल घेरे में बैठकर चर्चा करने से की गई। किताब में आए सन्दर्भों को स्थानीय सन्दर्भों से जोड़कर चर्चा की गई जो वाकई काफी मजेदार थी। किताब की कहानी को सुनने के बाद बाकी बच्चों के अनुभवों को जो उस किताब की कहानी से सम्‍बन्धित हो या उनसे इतर को साझा करने का काम किया गया।

इसके अलावा गोल घेरे में एक-एक पैरा पढ़ने, एक कहानी या कविता को पूरा-पूरा पढ़कर सुनाने, पढ़ी गई कहानी को रोचक तरीके से सुनाने जैसी गतिविधियाँ की गईं। पुस्तकालय की किताबों को प्रार्थना सभा में सुनाने का काम किया गया। इससे बच्चों में पढ़ने और पढ़े गए को सुनाने का काम बेहतर तरीके से होने लगा।

किताबों को कभी मन ही मन पढ़ने तो कभी सभी जोर-जोर से पढ़ते इससे जहाँ बोझिलता कम होती वहीं किताबों के प्रति एकाग्र होकर पढ़ने और शोर में भी पढ़ने की प्रवृति बढ़ने लगी। बच्चे किताबों से खेलने के बाद अब गंभीर पाठक बनने की ओर अग्रसर थे।

कक्षा एक के बच्चों के साथ अलग से चित्र पढ़ने व उसमें से जाने-पहचाने शब्दों को पढ़ने व उसके इर्द-गिर्द चर्चा से शुरूआत हुई। धीरे-धीरे बच्चों के साथ भाषा शिक्षण के दौरान पढ़ने की गतिविधियों में पुस्तकालय की किताबों का उपयोग किया जाने लगा।

किताबों से दोस्ती

बच्चों के साथ किताबों को लेकर बातचीत शुरू की गई। बातचीत में पढ़ी गई किताब का नाम, किताब की कहानी के अलावा किताब में और क्या-क्या चीजें हैं। जैसे किताब के लेखक का नाम, प्रकाशक, किताब का मूल्य, किताब में पन्नों की संख्या, किताब छपने के साल का जिक्र।

बातचीत के दौरान बच्चे इन सबको ढूँढने का प्रयास करते। और पढ़ी गई किताब के बारे में बताते। शुरुआत में इस चर्चा के साथ ही उनको किताब के बारे में जरुरत पड़ने पर बताया कि यह जानकारी से क्या आशय है।

पता नहीं शिक्षण में इस तरह के काम का कोई महत्व हो पर बच्चों के साथ काम करने के बाद महसूस हुआ कि बच्चे किताब को निकालते समय उसका नाम व किसने लिखा आदि का जिक्र करते। मुझे लगता है इससे किताबों के साथ उनका रिश्ता गहरा होता जाता है।

पढ़कर सुनाने का कौशल

एक प्रतिभागी को कहानी की पूरी किताब को पढ़़कर सुनाने के लिए कहा गया। कहानी को सभी ने ध्यान से सुना। इस पर चर्चा की गई कि इस तरीके की गतिविधि कक्षाओं में काफी होती है। इसको पुस्तकालय की किताबों में भी आजमाया गया।

पढ़ी गई कहानी को हाव-भाव के साथ सुनाया गया। जिसमें बाकी बच्चों को भी कहानी से जोड़ने की प्रयास किया गया। इस प्रक्रिया में कहानी सुनाने व सुनने वाले दोनों ही सक्रिय रूप से जुड़े थे। फिर से उसी कहानी को गढ़वाली, नेपाली में अनुवाद कर सुनाने को कहा गया। बच्चे बड़े रोचक तरीके से कहानी को गढ़वाली, नेपाली में सुनाते हैं। इसके बाद उसी कहानी पर बच्चों को चित्र बनाने के लिए भी कहा गया। चित्र बनाने के बाद अपने बनाए चित्र के बारे में सभी को बताना व किस तरीके से अभिव्यक्त कर रहे हैं पर चर्चा की जाती है।

किताबों का कक्षा शिक्षण में उपयोग

पुस्तकालय की किताबों का कक्षा शिक्षण से कैसे जुड़ाव हो इसके लिए प्रयास करने की कोशिश की गई। कक्षा में पढ़ाए गए पाठ से सम्‍बन्धित किताब को पुस्तकालय से छाँटकर उसको समूहों में पढ़ने का काम किया। पाठ के इर्दगिर्द बाकी किताबें क्या कहती हैं उसको समाहित करने का काम किया गया। इससे पाठ्यपुस्तक ही पठन-पाठन का एक मात्र स्रोत नहीं है, इस धारणा को अपने मन में स्थापित करने में मदद मिली। पाठों से सम्‍बन्धित अवधारणाओं के बारे में बच्चों को और जानने, अवधारणा की स्पष्टता के लिए पुस्तकालय की किताबों का उपयोग करने को प्रोत्साहित किया। इससे बच्चों में जूझने, चीजों को ढूँढकर पढ़ने और उसके महत्व का आभास होता है। ऐसा पुस्तकालय की गतिविधियों के दौरान महसूस हुआ।

पुस्तकों व पुस्तकालय का रखरखाव

किताबों के रखरखाव के लिए किताबों पर जिल्द लगाना, फटी किताबों को गोंद से चिपकाना, किताबों के मुड़े हुए पन्नों को सीधा करना, समय-समय पर किताबों को टाँगना व पुरानी किताबों को वापस आलमारी या बक्से में रखना। इन सब कामों को बच्चों के अलग-अलग समूहों में जिम्मेदारी देकर किया गया।

अपनी पुस्तक बनाना

किसी पुस्तकालय में यदि वहाँ पढ़ने वाले पाठक की किताब भी शामिल होती है तो पाठक का उस पुस्तकालय से और जुड़ाव बढ़ता है। ऐसे में वह पाठक यदि स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा या शिक्षक हो तो यह जुड़ाव और गहरा होने की संभावना है। पर ऐसे में सवाल उठता कि बच्चों की किताबें कैसे शामिल हों?

इसके लिए बच्चों व शिक्षकों के साथ मिलकर अपनी किताब बनाने का काम किया गया। जिसमें पुराने अखबारों से पाठ से सम्‍बन्धित चित्र या अपने मनपसन्‍द चित्र, अखबार की खबर को काटकर पन्नों पर चिपकाकर किताब तैयार करने का काम किया गया। इसको करने में जहाँ बच्चों को मजा आता है वहीं इसका उपयोग समय-समय पर कक्षा शिक्षण के दौरान टीएलएम के रूप में किया जा सकता है। परिवेश के पेड़, बीज, पौधों की जड़ों का संकलन कर उनको पन्नों पर चिपकाकर किताब का आकार बनाने की गतिविधि भी की जा सकती है।

अन्य पुस्तकालयों से जुड़ाव

स्कूल का पुस्तकालय दुनिया से अलग-थलग होने के बजाय उसको आसपड़ोस के पुस्तकालयों और गाँव के व्यक्तिगत पुस्तकालयों से जोड़ने का काम किया गया। इसके लिए जनपद तथा संस्थाओं द्वारा संचालित पुस्तकालयों व शिक्षा विभाग द्वारा संकुल और ब्लॉक स्तर के पुस्तकालयों से पुस्तकें लाकर पुस्तकों को बढ़ाने का काम किया गया।

अन्‍त में

बहुत सारे प्रशिक्षणों व पुस्तकालय को लेकर किताबों में बहुत से नियम और प्रक्रिया दी जाती है। किताबों की पहुँच बच्चों तक हो, जिम्मेदारियों का बँटवारा हो, समय-समय पर बच्चों के साथ बैठकें हों, न जाने क्या-क्या। मुझे लगता है स्कूल या समुदाय में एक सक्रिय पुस्तकालय के लिए जरूरी होता है बच्चों व समुदाय के प्रति विश्वास, थोड़ा सा प्यार, थोड़ा जूनून और कभी न खत्म होने वाले संवाद की।


जगमोहन चोपता, अज़ीम प्रेमजी इंस्टीट्यूट फॉर लर्निंग एण्ड डवलपमेंट, भटवाड़ी रोड़, उत्तरकाशी, उत्तराखण्‍ड

टिप्पणियाँ

pramodkumar का छायाचित्र

;यह लेख पुस्‍तकालय की उस बनी बनाई धारणा को तोडता नजर आता है जिसमें वह एक विशेष पाठक वर्ग तक ही सीमित रहता है । वास्‍तव में विद्यालय का पुस्‍तकालय किताबों का स्‍टोर मात्र नहीं होना चाहिए । दुर्भाग्‍य से वह विद्यालय की सजावट का एक तरीका के रूप में व्‍यवहार में आ रहा है । बच्‍चों को वह अपनी ओर बुला रहा है लेकिन दोनों के बीच में अध्‍यापक का तानाशाही रवैया एक बडी बाधा के रूप में सदा उपस्थित रहता है । कारण किताबें खराब और फट जाने का डर । अध्‍यापकों को इस संकीर्ण सोच से उबरना होगा । यह लेख एक आईने की तरह हमारे सामने है । बधाई

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