आओ बच्चो मानचित्र बनाएँ

शिक्षण योजना एवं उद्देश्य

सामाजिक विज्ञान विषय में आमतौर पर बच्चों को पाठ्यपुस्तक के माध्यम से पढ़ा दिया जाता है। उनको कुछ जानकारियाँ याद करवा दी जाती हैं। इस प्रकार के शिक्षण से बच्चों की समझ नहीं बन पाती है। सामाजिक विज्ञान शिक्षक के तौर पर हमने कुछ विषयों को चिन्हित किया ताकि बच्चों के साथ उन पर रुचिपूर्ण तरीके से शिक्षण कार्य किया जा सके। योजना के अनुसार कक्षा 6 के बच्चों के साथ मानचित्र पर शिक्षण कार्य किया गया। जिसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं -

       
o    मानचित्र कला को रोचक बनाना।
o    मानचित्र निर्माण की प्रक्रिया की समझ बनाना।
o    मानचित्र में दिशा, संकेत, पैमाने और रंगों के महत्व की समझ बनाना तथा दैनिक जीवन में इनकी उपयोगिता से जोड़ना।
o    चित्र, खाका, रेखाचित्र एवं मानचित्र के अन्‍तर की समझ बनाना।
o    मानचित्र के महत्त्व (उपयोगिता) की समझ बनाना।
o    घर, स्कूल, गाँव के मानचित्र निर्माण द्वारा मानचित्र निर्माण एवं मानचित्र पठन की कुशलताओं का विकास करना। 
o    घर, स्कूल, गाँव के मानचित्र निर्माण की प्रक्रिया द्वारा मानचित्र कला को अपने दैनिक जीवन से जोड़कर समझ पाना।

सबसे पहले "मानचित्र क्या है ?" प्रश्न पर बच्चों से चर्चा की गई। चर्चा और पाठ्यपुस्तक के माध्यम से हमारी समझ बनी कि मानचित्र दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘मान+चित्र’। जिसके विस्तृत अर्थ में पृथ्वी की सतह के किसी भाग / स्थान (नगरों/देशों/पर्वत/नदी आदि) की स्थिति को पैमाने की सहायता से कागज पर लघु रूप में प्रस्तुत करना मानचित्र कहलाता है। जैसे हम राजस्थान, भारत और विश्व का मानचित्र देखते हैं।

दरअसल; भूगोल और मानचित्र एक दूसरे के पूरक हैं। भूगोल का अध्ययन-अध्यापन दोनों मानचित्र के बिना असम्भव और अधूरा नजर आता है। अगर हम मानचित्र के उपयोग पर बात करें तो हमारे दैनिक जीवन में मानचित्र की बहुत अहम भूमिका है। वैज्ञानिक, यात्री, शिक्षक, शिक्षार्थी, सैनिक, पुलिस और व्यवसायी आदि के लिए मानचित्र बहुत उपयोगी है। आजकल मानचित्र केवल पृथ्वी या पृथ्वी की सतह तक ही सीमित नहीं है बल्कि चन्द्रमा, मंगल आदि ग्रहों के भी मानचित्र बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा किसी विचार या अवधारणा का मानचित्र भी बनाया जा सकता है।

इसके बाद हमने दैनिक जीवन में मानचित्र के उपयोग विषय पर चर्चा की। चर्चा में मानचित्र के निम्न उपयोग निकालकर सामने आए -
 

  • किसी अज्ञात स्थान के लिए मार्गदर्शिका जैसे- अस्पताल, इमारत, प्रमुख स्थान, गाँव, शहर, देश, रास्ता आदि।
  • भूमि स्वामित्व हेतु उपयोगी।
  • सरकार द्वारा नगर, गाँव, राज्य, देश की योजनाओं के निर्माण में।
  • सैन्य कार्यवाही, सैनिकों की तैनाती, शत्रु की स्थिति का पता लगाने में उपयोगी।
  • जल,थल और वायु मार्गों से यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए मददगार।
  • खनिज, जल, मिट्टी आदि की उपलब्धता व वितरण को दर्शाने में।
  • मानचित्र द्वारा आँकड़ों के निरूपण को और अधिक सरल व बोधगम्य बनाया जा सकता है।
  • मानचित्र द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को एक छोटे से कागज में समेटकर और एक बहुत छोटे भू-भाग को विस्तृत तरीके से प्रदर्शित करके समझने में बहुत अधिक मदद मिलती है, इत्यादि।

आमतौर पर बच्चों को मानचित्र देखना बहुत पसन्द होता है और सभी बच्चे मानचित्र के बारे में रुचि के साथ ध्यान से सुनते हैं किन्तु अधिकतर बच्चे मानचित्र पठन एवं उसके निर्माण में विशेष रुचि नहीं लेते हैं। दूसरा, बच्चों का मानचित्र कला से विशेष लगाव नहीं बन पाता है। साथ ही बच्चों को मानचित्र निर्माण के अवसर भी कम ही मिलते हैं।

अतः शिक्षक समूह ने मिलकर शिक्षण योजना बनाई कि हम मानचित्र पठन के साथ-साथ मानचित्र निर्माण करने का प्रयास करेंगे। मानचित्र निर्माण के लिए आसपास के उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा। योजना बनाने में जिला संस्थान के लोगों व अन्य विषयों के शिक्षकों से भी मदद ली गई।

दरअसल, कक्षा 6 में ब्रह्मांड,अंतरिक्ष,सौरमंडल और ग्लोब पर चर्चा हो चुकी थी। ग्लोब पर चर्चा के दौरान एक बच्चे ने प्रश्न पूछा “सर, ये दो आकार के ग्लोब क्यों हैं ? हमारी पृथ्वी इस छोटे ग्लोब जैसी है या बड़े ग्लोब जैसी है ?” प्रश्न पर सभी बच्चों ने अपने-अपने विचार रखे। चर्चा के दौरान मैंने बच्चों को बताया कि पृथ्वी आकार में बहुत बड़ी है इसलिए पृथ्वी के समान ग्लोब बनाना सम्भव नहीं है। इसलिए हमने पृथ्वी के आकार जैसा छोटा ग्लोब बनाया है जो आनुपातिक रूप से छोटा-बड़ा हो सकता है। इसलिए छोटे-बड़े दोनों प्रकार के ग्लोब एक जैसे ही हैं इत्यादि। मैंने बच्चों के साथ संक्षिप्त चर्चा की और फिर उसको अगले अध्याय की योजना में विस्तृत रूप से चर्चा करने की योजना बनाई।

मानचित्र और ग्लोब में अन्तर

सबसे पहले बच्चों के साथ मानचित्र व ग्लोब की उपयोगिता, महत्व, अन्‍तर और विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की गई। बच्चों के विचार इस प्रकार थे –

  • मानचित्र में छोटे से छोटे भू-भाग को भी दर्शाया जा सकता है ।
  • मानचित्र क्षेत्र/स्थान विशेष का भी हो सकता है जबकि ग्लोब सम्पूर्ण पृथ्वी का ही प्रतिरूप है।     
  • मानचित्र को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में सुविधा रहती है।
  • किसी जगह/स्थान का रास्ता बताने में मानचित्र उपयोगी है न कि ग्लोब।
  • पृथ्वी की वास्तविक आकृति समझने में ग्लोब मदद करता है न कि मानचित्र।
  • दिशाओं का पता बताने में मानचित्र एवं घूर्णन व परिक्रमण को समझने में ग्लोब मददगार है, इत्यादि।

बच्चों के साथ चर्चा के बाद यह निष्कर्ष सामने निकल कर आया कि ग्लोब एवं मानचित्र की अपनी-अपनी सीमाएँ हैं और दोनों की अपनी-अपनी विशेषताओं के साथ अपना महत्व भी है। चर्चा के दौरान एक प्रश्न आया कि मानचित्र और चित्र में क्या अन्‍तर है ? क्योंकि ग्लोब और मानचित्र में तो अन्‍तर स्पष्ट रूप से देखने पर ही समझ आता है। मानचित्र और चित्र में अन्‍तर समझाने के लिए बच्चों को कक्षा में लगे मानचित्र व चित्र दिखाए। सभी बच्चों को 5-5 के समूह में एटलस दिए गए। बच्चों ने कक्षा में लगे मानचित्र, चित्र व एटलस का अवलोकन कर एक दूसरे से चर्चा करके निष्कर्ष निकाला।

मानचित्र और चित्र में अन्‍तर

  • मानचित्र में दिशा होती है।
  • मानचित्र में दूर-दूर के स्थानों पर एक ही रंग है।
  • सभी मानचित्रों में सागर और महासागरों को आसमानी रंग से ही दिखाया गया है।
  • मानचित्र में दो देशों के मध्य अन्‍तर को अलग-अलग रंगों एवं सीमा रेखाओं से समझा जा सकता है, इत्यादि।

बच्चों का ध्यान विशेष रूप से जोर देने पर मानचित्र में नीचे बने पैमाने की ओर गया। जिस पर हमने बाद में काम करने कि बात कही।

मानचित्र निर्माण

मानचित्र, ग्लोब और चित्र में अन्‍तर पर चर्चा के बाद सभी बच्चों को कक्षा का मानचित्र बनाने का कार्य दिया गया। सभी बच्चों ने अपने-अपने अनुसार मानचित्र बनाए। किन्तु अधिकतर बच्चों द्वारा बनाए गए मानचित्र एक जैसे ही थे। बच्चों द्वारा बनाए गए मानचित्र में केवल शीर्षक का अन्‍तर था। जैसे एक बच्चे ने शीर्षक लिखा ‘मानचित्र’ दूसरे बच्चे ने लिखा ‘चित्र’। बच्चों के साथ मानचित्र और चित्र में अन्‍तर पर जो चर्चा हुई थी उसकी समझ बच्चों द्वारा बनाए गए मानचित्र में नहीं दिखी। बच्चे मानचित्र और चित्र में अन्‍तर नहीं कर पा रहे थे।

फिर बच्चों को समझाते हुए शिक्षक ने बताया कि मानचित्र शब्द का विच्छेद करके अर्थ को समझें। जिसमें मान शब्द को मुख्य फोकस किया गया।
            मानचित्र = मान + चित्र
            (मापक)- जिसका कोई मान हो।

“मापक” शब्द को समझने के लिए बच्चों को अलग-अलग समूहों में बाँटा गया। कक्षा में उपस्थित 30 बच्चों को 5-5 बच्चों के 6 समूहों में बाँटा गया। फिर बच्चों को फुटा (स्केल) के माध्यम से कक्षा की दीवार मापने (लम्बाई-चौड़ाई) का कार्य दिया गया।

एक बच्चे ने प्रश्न करते हुए कहा “सर, चार्ट तो बहुत छोटा है और हमारी नाप बहुत अधिक है, इसको कैसे करें ?” फिर सभी समूहों ने समस्या के समाधान पर मिलकर चर्चा की। चर्चा के दौरान मापक के महत्व को समझने का प्रयास किया गया फिर चर्चा के दौरान सहमति बनी कि एक फुटा (स्केल) को माचिस की एक तीली के समान मान लेते हैं, यानि     एक फुटा = एक तीली।

फिर सभी समूहों ने अपनी समझ के अनुसार पूरी कक्षा के 6 मानचित्र बनाए और सभी के सामने इन्हें प्रस्तुत भी किया। इस गतिविधि के माध्यम से बच्चे मापक(स्केल) के महत्त्व को समझ चुके थे। वे जान चुके थे कि कमरे का मानचित्र बनाने के लिए कमरे के बराबर कागज की आवश्यकता नहीं है। उसको छोटे से चार्ट या कागज पर भी प्रदर्शित किया जा सकता है। गतिविधि के बाद सभी बच्चों को होमवर्क के रूप में अपने घर के कमरों का मानचित्र बनाने का कार्य दिया गया। फिर अगले दिन सभी बच्चों के सामने प्रश्न रखा गया क्या सभी माचिस की तीलियों की लम्बाई बराबर होती है? अधिकतर बच्चों ने ना में उत्तर दिया। हालाँकि कुछ बच्चों ने बराबर भी बताया। प्रश्न पर विस्तार से बात की गई।

ग्‍लोब स्‍केल एवं विद्यालय का मानचित्र

योजना के अनुसार बच्चों से ग्लोबल यूनिट के आधार पर ग्लोबल स्केल वैश्विक पैमाना पर चर्चा की गई जैसे ग्लोबल स्किल क्या होता है और इसको कैसे इस्तेमाल किया जाता है। ग्लोबल स्केल की आवश्यकता को समझने के लिए एक कहानी (कितना बड़ा होता है फुटा ?) सुनाई गई (कहानी की लिंक)। इस चर्चा के बाद कक्षा के दो बच्चों ने अपने घर का मानचित्र बनाया जिसमें मापक इंच में माना गया बच्चों ने अपना मापक इंच, फिट में इसलिए मापा क्योंकि उन बच्चों के अभिभावक कारीगर का काम करते हैं और वह मकान बनाते समय इन इकाइयों का ही प्रयोग करते हैं।

ग्लोबल स्केल पर चर्चा के बाद विद्यालय का मानचित्र बोर्ड पर बनाया गया सभी छह समूह ने विद्यालय के अलग-अलग हिस्सों की माप ली। फिर बच्चों द्वारा विद्यालय का मानचित्र बनाया गया विद्यालय का मानचित्र बनाने के बाद बच्चों ने विद्यालय के मूल मानचित्र से इसकी तुलना की जो कि स्कूल एडमिन के द्वारा उपलब्ध करवाया गया। बच्चों के साथ दोनों मानचित्रों के अन्‍तर पर विस्तार से चर्चा की गई।

गाँव का मानचित्र

बच्चों द्वारा विद्यालय का मानचित्र बनाने और उस पर विस्तार से चर्चा के बाद सभी बच्चों को गाँव का मानचित्र बनाने का कार्य दिया गया। गाँव के मानचित्र बनाते समय बच्चों को अपना घर बनाने के साथ गाँव की मुख्य सड़कें, नल, नहर और पेट्रोल पम्प आदि प्रमुख स्थान बनाने का कार्य दिया गया। सभी बच्चों ने चार्ट पेपर पर गाँव के मानचित्र का प्रदर्शन किया। बच्चों ने इसमें मुख्य मार्गों सहित गाँव के प्रमुख स्थानों को भी प्रदर्शित किया गया। सभी बच्चों द्वारा निर्मित गाँव के नक्शे को एकरूपता देने के लिए शिक्षक ने उसे ब्लैक बोर्ड पर प्रदर्शित किया।

इस कार्य को अधिक रुचिकर और बेहतर बनाने के लिए विद्यालय का एक 3D मॉडल बनाने की योजना बनाई गई। योजना में विद्यालय के अन्य शिक्षकों की मदद ली गई।

सबसे पहले सभी बच्चों ने मिट्टी से अपना-अपना घर बनाया और उस पर रंग करके अपना नाम लिखा। ताकि मानचित्र में नाम से पहचान सकें कि यह घर किसका है ? बच्चों द्वारा घर बनाने के बाद गाँव के सभी रास्ते बनाए गए। रास्ते बनाते समय मुख्य रास्ते को ध्यान में रखा गया। मुख्य सड़क को दर्शाने के लिए कोयले का बुरादा तथा काले रंग का प्रयोग किया गया तथा कच्चा मार्ग दिखाने के लिए लाल मिट्टी का ही प्रयोग किया। क्योंकि योजना के अनुसार मानचित्र (मॉडल) ऐसा हो जो बच्चों को वास्तविक जैसा दिखे।

इसके बाद बच्चों द्वारा गाँव के मुख्य मार्गों को बनाया गया तथा गाँव के प्रमुख स्थानों (संकेतों) को मानचित्र मॉडल में स्थान दिया गया जैसे मुख्य चौराहा (पलसा), मंदिर–मस्जिद, अस्पताल(PHC) , खाड्या (नाला), तालाब, पुलिया, पेट्रोल पम्प और गाँव के विद्यालय आदि।

गाँव के मुख्य स्थानों को प्रदर्शित करने के बाद बच्चों को अपने घर की वास्तविक स्थिति का पता चल गया। बच्चों ने फिर अपने-अपने घरों को मानचित्र मॉडल में सही स्थान पर प्रदर्शित किया। इस गतिविधि के बाद लगभग सभी बच्चों की समझ अपने गाँव के मॉडल मानचित्र पर बन चुकी थी। मानचित्र को देख कर अन्य कक्षाओं के बच्चों ने संकेतों के आधार पर गाँव के मुख्य स्थानों सहित अपने घरों की पहचान की। इस मानचित्र (मॉडल) के माध्यम से आसानी से गाँव को समझा जा सकता है। जैसे गाँव का मुख्य रास्ता कौन-सा है ? स्कूल, धार्मिक स्थल और सामुदायिक भवन आदि कहाँ पर स्थित हैं, साथ ही कक्षा के सभी बच्चों के घर को तो पहचाना ही जा सकता है बल्कि इनकी मदद से स्कूल के सभी बच्चों के घर का अनुमान भी लगाया जा सकता है ?

स्कूल के सभी बच्चे मानचित्र और चिन्हों को देखकर अपने-अपने घर की स्थिति और स्कूल से घर तक पहुँचने के मार्ग और प्रमुख स्थानों का अभ्यास कर रहे थे। बच्चों ने मानचित्र (मॉडल) को वास्तविक रूप देने के लिए स्वप्रेरणा से गाँव के तालाब को अपने घर से सीमेंट लाकर पक्का किया और उसे पानी से भरा। फिर बच्चों ने शिक्षकों की मदद से मन्दिर, मस्जिद, स्कूल और पेट्रोल पम्प के मॉडल बनाए तथा गाँव के मुख्य मार्गों के लिए दिशा संकेत भी बनाए। इन्हें बनाने के बाद मानचित्र (मॉडल) अधिक आकर्षक, प्रभावी व जानकारी से परिपूर्ण लग रहा था। बच्चों के द्वारा किए गए कार्य व चर्चा के आधार पर लगता है कि मानचित्र को लेकर बच्चों की स्थाई समय बनी।

शिक्षक समूह के अनुभव

मानचित्र बनाने के दौरान बच्चे मानचित्र बनाने की प्रक्रिया सहित उसमें इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और संकेतों (मानचित्र के घटकों)से भी परिचित हुए। पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय संसाधनों को प्रयोग में लिया गया।

मानचित्र बनाने के दौरान कुछ चुनौतियाँ भी आई जैसे- बच्चे वास्तविक और मानचित्र की दिशा को लेकर उलझन में थे, मानचित्र में पानी का रंग नीला ही क्यों दिखाया जाता है और संकेत और रंगों का उपयोग कैसे करें आदि।

बच्चों ने मानचित्र बनाने के कार्य में रुचि के साथ भाग लिया। बच्चे खेल-खेल में रोचक तरीके से मानचित्र के मुख्य बिन्दुओं से परिचित हो गए कुछ बच्चे मानचित्र पठन में रुचि नहीं लेते थे किन्तु इस गतिविधि के माध्यम से उन बच्चों ने भी रुचि के साथ गतिविधियों में बढ़ चढ़कर भाग लिया।

इस गतिविधि के अनुभवों से लगता है कि अगर सामाजिक विज्ञान पढ़ाते समय बच्चों को पाठ्यपुस्तक से हटकर उनके परिवेश से जोड़ते हुए पढ़ाया जाए तो बच्चे करके सीखते हैं तथा रुचि के साथ गतिविधि में भाग भी लेते हैं लेकिन इसके लिए बच्चे के परिवेश में उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखकर योजना बनाने की जरूरत होती है।


School: Azim Premji School, Bamore
Village: Bamore Block: Tonk Class: 6th
Teacher Name: Kuldeep Sharma
Total Students: 30
Theme: Map
Time: 45 minute per day (15 Classes)
Report Writing: Kuldeep Sharma & Mujtba

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