पौधों और मानव में श्‍वसन

बच्‍चों के साथ प्रयोग

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बुनियादी जानकारी

हम सभी जानते हैं कि श्वसन सभी जीवों के लिए अतिआवश्यक प्रक्रिया है। जिसमें जीव गैसों का आदान-प्रदान करते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में अधिकतर इसे सामान्य रूप से चर्चा करके और कुछ जानकारियों के रूप में बताकर छोड़ दिया जाता है। बच्चों को बता दिया जाता है कि मानव श्वसन के दौरान ऑक्‍सीजन लेते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड छोड़ते हैं जबकि पौधे हमारे द्वारा छोड़ी गई कार्बन डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करते हैं और ऑक्‍सीजन छोड़ते हैं। मैं भी बचपन में ऐसा बच्चा रहा हूँ, जिसे कक्षा में ज्यादा सवाल करने के मौके नहीं मिले थे। इसलिए हम गुरुजी की बात जैसी की तैसी मान लेते थे, चाहे वो इतिहास से जुड़ी हो या विज्ञान से। किन्तु जब से हमें सवाल करने के मौके मिले हैं तब से हर बात का कारण जानने के प्रति हमारी जागरूकता बढ़ी है। कक्षा में भी हम बच्चों को खूब सवाल पूछने और और उनका हल खोजने के प्रति प्रेरित करते रहते हैं। ठीक ऐसे ही स्वयं प्रयोग करके देखना भी बड़ी कक्षाओं में ही हो ऐसा जरूरी तो नहीं। पर्यावरण शिक्षक होने के नाते मैं अपनी हर कक्षा में बच्चों को स्वयं करके देखने का कोई मौका नहीं छोड़ता। और यदि वह प्रयोग उनके परिवेश और उपलब्ध संसाधनों से जुड़ा हुआ हो तो कहने ही क्या। कुछ ऐसा ही एक कक्षा कक्षीय अनुभव आपके साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ।

कक्षा 4 में पेड़-पौधों के बारे में चर्चा के दौरान बच्चों से जब पूछा गया कि पेड़-पौधे हमारे क्या काम आते हैं ? तो बच्चों ने बताया कि हमें इनसे लकड़ी, फल, सब्जी, छाया, चारा आदि मिलते हैं। जब उनसे पूछा गया कि अगर पेड़-पौधे नहीं होंगे तो क्या होगा ? इस प्रश्न के जवाब में बच्चों ने एक स्वर में कहा कि, “हम मर जाएँगे”। मैंने पूछा क्यों तो एक बच्चे ने कहा कि, “हमें साँस लेने के लिए गैस कहाँ से मिलेगी ?” मैंने कहा कौन-सी गैस तो थोड़ी देर की चुप्पी के बाद एक बच्चे ने कहा, ‘ऑक्‍सीजन गैस’। इस विषय पर जब बहुत से सवाल-जवाब हो चुके थे तो मैंने पूछा कि आपको कैसे पता कि पौधों से हमें ऑक्‍सीजन गैस मिलती है। उन्होंने तपाक से उत्तर दे दिया कि, “पिछली कक्षा में सर ने हमें बताया।”

बिल्कुल यही तो होता आया है, मेरे साथ भी यही हुआ और अब बच्चों के साथ भी। आज की कक्षा के बाद मेरे दिमाग में भी यही बात गूँज रही थी कि मैं भी कितना आज्ञाकारी शिष्य था जो अपने टीचर द्वारा कही बात को जैसी की तैसी मान लेता था। लेकिन मैं चाहता था कि आज मुझे मौका मिला है तो क्यों न मैं अपनी और बच्चों की जिज्ञासा को किसी माध्यम द्वारा शान्त कर सकूँ। अतः खाली समय मिलते ही मैं स्कूल की लाइब्रेरी में गया और इस विषय पर सम्भावित जानकारियाँ जुटाने लगा। पुस्तकालय की किताबों को खँगालने और विज्ञान शिक्षक से चर्चा करने के बाद मैंने बच्चों के साथ भी श्वसन से जुड़े कुछ प्रयोग करके उनकी समझ को स्थायी रूप देने की ठान ली। स्कूल के विज्ञान शिक्षक की मदद से विज्ञान की प्रयोगशाला के उपकरण और अन्य जानकारियाँ जुटाने के बाद एक बार हमने यह प्रयोग करके देखे। जिससे कि बच्चों के सामने भी ये सफल रहे।

गतिविधि -1  

बच्चों के साथ सबसे पहले श्वसन प्रक्रिया की सामान्य समझ बनाने के लिए हम सभी ने आँखें बन्‍द करके साँस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया को नाक के आगे हाथ लगाकर महसूस किया। बच्चों ने इसे महसूस करके तुरन्‍त बता दिया कि जब हम श्वसन क्रिया के दौरान गैस छोड़ते हैं तो वह गर्म होती है। इसे समझने के लिए हमने प्रयोगशाला में रखी मानव शरीर के आन्तरिक अंगों को दर्शाने वाली डमी का प्रयोग किया। जिसके द्वारा बच्चों ने श्वसन प्रक्रिया में काम आने वाले अंगों, फेफडों की स्थिति एवं कार्य प्रणाली को समझा। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया द्वारा उन्होंने यह भी जाना कि जब हमारे द्वारा ग्रहण की गई वायु शरीर के अन्दर जाकर फेफड़ों से होकर पुनः निकलती है तो वह शरीर के आन्तरिक ताप, फेफड़ों से गुजरने के कारण गर्म भी हो जाती है।

गतिविधि – 2  

अगले दिन हमने काँच के एक बीकर में चूने के पानी का घोल तैयार किया। इसे तैयार करने के लिए चूने को पानी में घोलकर उसे कुछ देर के लिए रख दिया जिससे कि पानी निथर जाए। लगभग 10 मिनट बाद इसमें से थोड़ा-सा निथरा हुआ चूने का पानी लेकर एक कोनिकल फ्लास्क में डाला। प्रयोग को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इस फ्लास्क में दो छेद वाला कॉर्क लगाकर उसमें दो नालियाँ डाली। इनमे से एक नली को घोल में डुबो दिया और दूसरी नली को घोल से थोड़ा ऊपर रखा जिससे कि निर्बाध रूप में गैस अन्दर-बाहर हो सके। अब कक्षा के कुछ बच्चों के द्वारा इसमें लम्बी साँस लेकर छोड़ने के लिए कहा गया। बच्चे उत्सुकता से सारे प्रयोग को देख रहे थे और धीरे-धीरे चूने के पानी का रंग बदलने लगा। तीन बार इस प्रक्रिया को दुहराने के बाद ही सारे पानी का रंग दूधिया हो गया। इस प्रयोग द्वारा यह सिद्ध हो चुका था कि हमारे द्वारा श्वसन क्रिया में छोड़ी गई गैस में कार्बन डाई-ऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है। प्रयोग के बाद बच्चों से इसके बारे में खूब बात की गई और घर पर भी इस प्रयोग को स्वयं करके दुहराने के लिए कहा। उन्हें बताया गया कि ज़रूरी नहीं कि हम प्रयोगशाला के इन उपकरणों द्वारा ही प्रयोग करें। इनकी जगह हम काँच के गिलास या प्लास्टिक की पारदर्शी बोतल का भी उपयोग कर सकते हैं।

प्रयोग करने के बाद कक्षा के कुछ बच्चों ने कहा कि, “सर, हम इस प्रयोग को असेंबली में प्रदर्शित करना चाहते हैं।" मैंने तुरन्‍त सहमति जताते हुए उन्हें आवश्यक सामग्री उपलब्ध करवा दी और अगले दिन बच्चों के इस समूह ने यह प्रयोग सभी बच्चों के सामने प्रदर्शित किया और इस बारे में सवाल-जवाब भी किए।

गतिविधि – 3

मानव श्वसन के बाद अब बारी थी पौधों में श्वसन की। इसके लिए कक्षा में सबसे पहले पौधों में श्वसन और प्रकाश संश्लेषण विषयों पर पूरे एक दिन बात की गई। बच्चों को यह जानकार बड़ा आश्चर्य हुआ कि पौधे भी हमारी तरह श्वसन प्रक्रिया में ऑक्‍सीजन लेते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं। जबकि उनका मानना बिल्कुल उल्टा था। अतः बच्चों को प्रकाश संश्लेषण और श्वसन प्रक्रिया में अन्तर समझाया गया। अब हम इसको जाँचने के लिए प्रयोग करने को तैयार थे।

इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य दिन के समय पौधों द्वारा छोड़ी जाने वाली गैस को जाँचना था। इसके लिए हमने एक पारदर्शी पॉलीथीन, धागा,पौटेसियम हाईड्रौक्साइड (KOH), मोमबत्ती, माचिस की तीली, काँच का गिलास लिया। हमने एक पारदर्शी पॉलिथीन में KOH+जल का घोल (ताकि पौधों द्वारा श्वसन क्रिया में छोड़ी गई कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस को KOH सोख ले) रख दिया और उसे एक पेड़ पर कस के बाँध दिया। इसके लिए हमने धागे और टेप की मदद ली। इस प्रक्रिया के दौरान हमारी कोशिश यह थी कि पॉलिथीन में एकत्रित गैस बाहर न निकले। लगभग 3 घण्‍टे के बाद हमने थैली को सावधानी पूर्वक पौधे से अलग किया और इसे प्रयोगशाला में ले गए। इसके बाद हमने एक जलती हुई मोमबत्ती लेकर उसे एक काँच के गिलास से ढकते हुए उसमें पॉलिथीन में छेद करके एकत्रित गैस को गिलास के अन्दर छोड़ा। हमने पाया कि मोमबत्ती अधिक तीव्रता से जलने लगी और गिलास से पूरी तरह ढँकने के बाद भी मोमबत्ती देर तक जलती रही। इस प्रक्रिया को हमने तीन बार दोहराया। परिणाम तीनों बार ही समान रहे। इस प्रक्रिया से यह तो सिद्ध हो चुका था कि पॉलिथीन में एकत्रित गैस ऑक्‍सीजन ही है। इस सम्पूर्ण प्रयोग से बच्चों को यह समझने में मदद मिली कि दिन के समय सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के दौरान कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस लेते हैं और ऑक्‍सीजन गैस छोड़ते हैं।

गतिविधि – 4  

रात्रि में, जब पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं हो रही होती है तो, कार्बन डाई-ऑक्साइड का निष्कासन ही मुख्य रूप से होता है। इस तथ्य को जाँचने के लिए कक्षा में तो यह प्रयोग दिन के समय कर पाना सम्‍भव नहीं था अतः चर्चा के बाद हमने बच्चों के दो समूह (बच्चों के घरों की स्थिति के आधार पर) बनाकर उन्हें आवश्यक सामग्री घर पर रात में प्रयोग करने हेतु दे दी। साथ ही बच्‍चों के अभिभावकों से उनकी मदद करने के लिए भी फोन पर सूचित कर दिया। दोनों समूहों ने रात को एक पारदर्शी पॉलीथीन में चूने के पानी का घोल रखकर उसे पेड़ पर कसकर बाँध दिया। लगभग 3 घण्‍टे बाद ही उनके अभिभावक ने मुझे व्‍हाटसअप पर उसकी दोनों फोटो भेज दी और बताया कि थैली में रखे चूने के पानी का रंग दूधिया हो गया। सुबह 6 बजे तक दोनों जगहों से भेजी गई फोटो में चूने के पानी का दूधिया रंग साफ-साफ दिखाई दे रहा था। अगले दिन कक्षा में इन दोनों प्रयोगों के बारे में फोटो दिखाकर बात की गई। अब बच्चों की यह समझ बन चुकी थी कि श्वसन क्रिया में पौधों द्वारा छोड़ी गई गैस में कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस की ही अधिकता रहती है। बच्चे जान चुके थे कि पौधे भी हमारी तरह श्वसन क्रिया में ऑक्‍सीजन गैस लेते हैं और कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं।

हमारी समझ :

  • बच्चों को प्रयोगों और प्रयोगशाला के प्रति सहज बनाने के लिए प्राथमिक स्तर पर भी समय-समय पर प्रयोगशाला से परिचित करवाते रहना चाहिए।
  • प्राथमिक स्तर पर बच्चों की अवधारणात्मक समझ बनाने के लिए छोटे-छोटे प्रयोगों को अधिक स्थान दिया जा सकता है।
  • बच्चों को स्वयं करके सीखने के अधिकाधिक मौके उपलब्ध करवाकर अधिगम को स्थायी बनाया जा सकता है।
  • उपलब्ध संसाधनों का उपयुक्त उपयोग करने पर अधिगम को रोचक और प्रभावी रूप दिया जा सकता है।
  • इस तरह की गतिविधियों से अधिगम प्रक्रिया में अभिभावकों की भागीदारी को भी बढ़ाया जा सकता है।
  • कार्य के दौरान हमने पाया कि कुछ और भी प्रयोग किये जा सकते हैं जिनसे यह पता चल सके कि हम श्वसन क्रिया में मुख्य रूप से ऑक्‍सीजन गैस का उपयोग करते हैं।
  • पौधों में श्वसन क्रिया को दर्शाने के लिए हाइड्रिला पादप को ही अधिकतर काम में लिया जाता है। लेकिन बच्चे हाइड्रिला से परिचित ही नहीं थे या यूँ कहें कि उनके परिवेश में हाइड्रिला पादप नहीं पाया जाता है इसीलिए हमने परिवेशीय पौधों के साथ ही प्रयोग करने का निर्णय लिया। मेरा मानना है कि परिवेशीय उदाहरणों द्वारा शिक्षण–अधिगम को और अधिक प्रभावी बनाया सकता है।

कुलदीप शर्मा, अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल,टोंक, राजस्‍थान

 

 

 

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