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By UshaShukla | Jun 22, 2016

शाला दर्पण की प्रविष्टियाँ एक भव्य और प्रेरणामय आकार लें यही हम सब की कामना है। किंतु......एक अवरोध अभी है जो अपव्यय एवं अवरोधन का कारण बनता है शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े बच्चों के लिए हमने उपचारात्मक शिक्षकों की व्यवस्था की जो ज़मीनी स्तर पर पूर्ण अंशों में फलप्रद न होने पर भी एक सराहनीय प्रयास साबित हुई है।

किंतु....उन बच्चों के लिए हम क्या कर पाए हैं जो बौद्धिक रूप से पिछड़े हैं?
कक्षाओं में सिर झुकाए बैठे हुए,शिक्षक के कुछ पूछने पर ज़मीन में आँखें गड़ाए हुए धीरे धीरे आना बद कर देते हैं और हमारे सारे प्रयास एकबारग़ी धरे रह जाते हैं।
* अगर ये बच्चे लगातार आठ वर्ष तक शाला में आये भी तो क्या उतना सीख पाएँगे जितनी हमें अपेक्षा है?
*्क्यों न नूतन सत्र में एकबार हम अपने प्रदेश के ऐसे बच्चों की पहचान करें ?
* नूतन सत्र से इनकी शिक्षा के लिए पृथक् रणनीति बनाएँ?
* यदि ये पर्याप्त विकास नहीं कर पाते हैं तो शिक्षा का अधिकार के तहत इनके लिए 6वर्ष की किताबी और 2 वर्ष की व्यावसायिक शिक्षा के लिए प्रयास करें जो इनके जीवन के लिए उपादेय साबित हो?
नूतन सत्र में हमारे सारे लक्ष्य पूर्ण हों।

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उषा जी, दो-तीन बातों पर ध्‍यान दें। 1. आपने यह विचार के लिए यह विषय अंग्रेजी पोर्टल के 'डिस्‍कशन फोरम' में पोस्‍ट किया है। बेहतर होता कि आप इसे पोर्टल के हिन्‍दी सेक्‍शन में पोस्‍ट करतीं, जहाँ इस पर चर्चा हो सकती । 2. आपने जो भाषा इस्‍तेमाल की है वह कुछ ज्‍यादा ही अलंकारिक हो गई है। 3. कृपया यह स्‍पष्‍ट करें कि बौद्धिक रूप से पिछड़े होने से आपका क्‍या तात्‍पर्य है ? 4. एनसीएफ समावेशी शिक्षा की बात करता है, लेकिन आप तथाकथित बौद्धिक रूप से पिछड़े बच्‍चों के लिए अलग रणनीति बनाने की बात कर रही हैं। वह क्‍या है ?

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